GET IT ONGoogle PlayDownload ONApp StoreSign Up!Loginmodifyमुद्दतो से तरस रही हूँ...मुद्दतो से तरस रही हूँ …दो मीठे लब्ज सुनने को!'बेटा! बोल'न फोन न कोई चिट्ठी!न वह सिर पर हाथ फेरना …न वह संक्रांति के 'तिळ गुळ'न वह 'साबूदाने सी दवाईयां'न वह कड़वी-कड़वी डांटन वह अनुशासन का पाठ ....आखिर ...LabelDirected by पढ़ने के लिए लॉगिन/रजिस्टर करेंपढ़े द्वारा कुसुम सुराणाThe Critic’s Cornerइस पर लोग क्या कह रहे हैं टिप्पणी लिखें