मुद्दतो से तरस रही हूँ...
मुद्दतो से तरस रही हूँ …दो मीठे लब्ज सुनने को!'बेटा! बोल'न फोन न कोई चिट्ठी!न वह सिर पर हाथ फेरना …न वह संक्रांति के 'तिळ गुळ'न वह 'साबूदाने सी दवाईयां'न वह कड़वी-कड़वी डांटन वह अनुशासन का पाठ ....आखिर ...
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