GET IT ONGoogle PlayDownload ONApp StoreSign Up!Loginmodifyकुण्डलिया छन्द -चातक!१.कानन करता गर्जना, सिंह चलाता राज।कर शिकार खुद आप ही, निपटे भोजन काज।।निपटे भोजन काज, मानता अपनी मरजी चातक मस्तक साज, भेजता वर्षा अरजी।ताल-तलैया देख, खोलता न कभी आनन।विहग बड़ा खुद्दार, बून्द बिन ...LabelDirected by पढ़ने के लिए लॉगिन/रजिस्टर करेंपढ़े द्वारा कुसुम सुराणाThe Critic’s Cornerइस पर लोग क्या कह रहे हैं टिप्पणी लिखें