कुण्डलिया छन्द -चातक!
१.कानन करता गर्जना, सिंह चलाता राज।कर शिकार खुद आप ही, निपटे भोजन काज।।निपटे भोजन काज, मानता अपनी मरजी चातक मस्तक साज, भेजता वर्षा अरजी।ताल-तलैया देख, खोलता न कभी आनन।विहग बड़ा खुद्दार, बून्द बिन ...
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