मजदूर.. कितना मजबूर!
शीर्षक : मजदूर.. कितना मजबूर! गुमनामी के घने अंधेरों में, भटकता प्रवासी मजदूर, घरों से दूर, थक कर चूर, मजदूर.. कितना मजबूर! दो वक़्त रोटी की खातिर, दुत्कार सहने को मजबूर...
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