मन का मृग
यूं सुकूं हर पहर में ढूंढते रहते हैं हम ।खुद को ही घर में ढूंढते रहते हैं हम ।एक दुश्मन भी होता तो अच्छा होता,दोस्त क्यों शहर में ढूंढते रहते हैं हम ।शाख जिसकी हमने खुद काटी थी,फूल उस शजर में ढूंढते र...
पढ़ने के लिए लॉगिन/रजिस्टर करेंपढ़े