GET IT ONGoogle PlayDownload ONApp StoreSign Up!Loginmodifyमन का मृगयूं सुकूं हर पहर में ढूंढते रहते हैं हम ।खुद को ही घर में ढूंढते रहते हैं हम ।एक दुश्मन भी होता तो अच्छा होता,दोस्त क्यों शहर में ढूंढते रहते हैं हम ।शाख जिसकी हमने खुद काटी थी,फूल उस शजर में ढूंढते र...LabelDirected by पढ़ने के लिए लॉगिन/रजिस्टर करेंपढ़े द्वारा शुभम आनंद मनमीतThe Critic’s CornerWhat people are talking about this टिप्पणी लिखें