कुण्डलिया छन्द - श्रमिक!
अविचल राही मार्ग का, चलता कंटक भूल |संभल-संभल चल श्रमिक, पथपर पत्थर-धूल ||पथपर पत्थर-धूल, कोहरा जग में छाया |निर्माता के हाथ, ठीकरा खाली आया ||निर्धन, भूखा लाल, सिर्फ दो रोटी चाही |शोषित-वंचित जीव, मा...
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