दोहे
विधा: दोहा छंद।चल री बहना भंवरी, भरे कूप से नीर।घास-फूस की झोपड़ी, आँगन काग अधीर।।प्यासी गौ-माँ-श्वान भी , बुझा-बुझा सा ताप।कट-कट करते दाँत हैं, जीवन लगता शाप।।गड्डे खाली पेट के, नयन बहे हैं पीड़।भरी रा...
पढ़ने के लिए लॉगिन/रजिस्टर करेंपढ़े