GET IT ONGoogle PlayDownload ONApp StoreSign Up!Loginmodifyगहरे भाव दो घंटे हो चुके थे, गिरीश को घर आकर लेकिन वह एक स्तब्ध मूर्ती स्वरूप अपने सोफे पर बैठा रहा। घर में सब लोग थे किन्तु गिरीश न जाने कहाँ खोया हुआ था। बेटी रेश्मा, तुम बाहर कोई डरावना सिनेमा ...LabelDirected by पढ़ने के लिए लॉगिन/रजिस्टर करेंपढ़े द्वारा MANTHAN DEOREThe Critic’s Cornerइस पर लोग क्या कह रहे हैं टिप्पणी लिखें