GET IT ONGoogle PlayDownload ONApp StoreSign Up!Loginmodifyफन्दे की गांठ!शोहरत की बाहों में बाहें मेरी,भीड़ इंतज़ार में बाहर खड़ी!इक झलक पाने को बेताब मेरी!नाचे मयूर देख सावन-झड़ी!अनजान, अजनबी, रिश्तेदार मेरे, ऐरा-गैरा, नत्थू-खैरा, खड़ा द्वार मेरे,चाहनेवालों की थी फ़ेहरिश्त...LabelDirected by पढ़ने के लिए लॉगिन/रजिस्टर करेंपढ़े द्वारा कुसुम सुराणाThe Critic’s Cornerइस पर लोग क्या कह रहे हैं टिप्पणी लिखें