फन्दे की गांठ!
शोहरत की बाहों में बाहें मेरी,भीड़ इंतज़ार में बाहर खड़ी!इक झलक पाने को बेताब मेरी!नाचे मयूर देख सावन-झड़ी!अनजान, अजनबी, रिश्तेदार मेरे, ऐरा-गैरा, नत्थू-खैरा, खड़ा द्वार मेरे,चाहनेवालों की थी फ़ेहरिश्त...
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