GET IT ONGoogle PlayDownload ONApp StoreSign Up!Loginmodify चरण!जीवन की आपाधापी में, उलझी रिश्तों की डोरी! मन व्याकुल लुकाछिपी में, फिज़ा में धुंध भारी! कौन अपना, कौन पराया, मन में खींचतान जारी! गुरु चरण रज माथे धरूं, कृपा निधान! कृपा न्यारी...LabelDirected by पढ़ने के लिए लॉगिन/रजिस्टर करेंपढ़े द्वारा कुसुम सुराणाThe Critic’s Cornerइस पर लोग क्या कह रहे हैं टिप्पणी लिखें