विवाह का घर!
विवाह का घर... माँ-बाबूजी नाराज थे मुझ से... दिल जो तोड़ा था मैंने उनका शीशे के फूलदान सा! आँगन के जामुन के पेड़ से टूट कर धरा पर अस्तव्यस्त बिखरे जामुन से बिखरे थे उनके अरमान! एकलौती बेटी थी न मैं...
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