GET IT ONGoogle PlayDownload ONApp StoreSign Up!Loginmodifyमनहरण घनाक्षरी - दीपक जलाइए....अंतस के भीतर की।नफरत के पौध की।क्रोध रूपी कंटक की।पराली जलाइए।।खल दल मान हरे।पापी को भी क्षमा करे।ममता अंतस भरे।अमृत पिलाइए।।ज्ञान अमि घट भरो, दीन-दुखी कष्ट हरोस्नेह भाव सँग धरो,समता फैलाइए।।भव-भ...LabelDirected by पढ़ने के लिए लॉगिन/रजिस्टर करेंपढ़े द्वारा कुसुम सुराणाThe Critic’s Cornerइस पर लोग क्या कह रहे हैं टिप्पणी लिखें