अपनापन!
अपनापन! गमले के पौधे पर डोलती गुलाब की कली भी सूरज की रश्मियों के स्पर्श से खिल उठती है, अपने हरे-हरे पटों को खोल कर, पंखुड़ियां फैला कर मुस्कुराने लगती है ...तो हम तो ठहरें सामाजिक प...
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