मजदूर.. कितना मजबूर!
अकेलेपन के अंधेरों में,भटकता प्रवासी मजदूर,घर से दूर, थक कर चूर,मजदूर, कितना मजबूर!दो वक़्त रोटी की खातिर,दुत्कार सहने को मजबूर!पेट के गड्ढे भरता मजदूर, ढूंढ़े बासी रोटी के दो कौर!सगे सम्बन्धी न पर...
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