अरुण छंद!
अरुण छंद।आँधियाँ, जब चली, लौ बुझी दीप की।जंग  है, ज्वार  से,  यह लहर-सीप की।।तोड़ दो, बंध अब, खोल दो  द्वार  को।चित्त में, भर घुटन, तोल मत प्यार को।।प्रीत की, रीत है, बांसुरी त...
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