GET IT ONGoogle PlayDownload ONApp StoreSign Up!Loginmodifyअरुण छंद!अरुण छंद।आँधियाँ, जब चली, लौ बुझी दीप की।जंग है, ज्वार से, यह लहर-सीप की।।तोड़ दो, बंध अब, खोल दो द्वार को।चित्त में, भर घुटन, तोल मत प्यार को।।प्रीत की, रीत है, बांसुरी त...LabelDirected by पढ़ने के लिए लॉगिन/रजिस्टर करेंपढ़े द्वारा कुसुम सुराणाThe Critic’s Cornerइस पर लोग क्या कह रहे हैं टिप्पणी लिखें