दोहे....
माली सींचे बाग को, स्वेद खिलाये फूल| आयी ऋत रे बावरी, नाचे खग जग भूल ||1|| खाली बैठा बावरा, करे शिकायत रोज| बैठे-बैठे साहिबा, मिले न मिष्ठी भोज ||2|| जो नर भींचे आँख को,...
पढ़ने के लिए लॉगिन/रजिस्टर करेंपढ़े