GET IT ONGoogle PlayDownload ONApp StoreSign Up!Loginmodify ढलता सूरज.... दिलों के दर्द को न बढ़ाओ... मान जाओ न... तन्हाईयों में हमें न तड़पाओं... लौट आओ न... कम्बख्त जवानी गुजर गई चंद रुपएँ कमाने में, बची-खुची, नौनिहालों को कंधों पर घुमाने में! दिल की कर ...LabelDirected by पढ़ने के लिए लॉगिन/रजिस्टर करेंपढ़े द्वारा कुसुम सुराणाThe Critic’s Cornerइस पर लोग क्या कह रहे हैं टिप्पणी लिखें