GET IT ONGoogle PlayDownload ONApp StoreSign Up!Loginmodifyमजदूर!एकाकीपन के अंधेरों में,भटकता प्रवासी मजदूर,घरों से दूर, थक कर चूर,मजदूर, कितना मजबूर!दो वक़्त की रोटी की खातिर,हर दिन ढूंढे नएं-नएं ठौर!पेट के गड्डे भरने खातिर, चाहे बासी रोटी के दो कौर!न सगे सम्ब...LabelDirected by पढ़ने के लिए लॉगिन/रजिस्टर करेंपढ़े द्वारा कुसुम सुराणाThe Critic’s Cornerइस पर लोग क्या कह रहे हैं टिप्पणी लिखें