अंतस का क्रन्दन...
दशरथनन्दन, अंतस करे क्रन्दन,क्षमाप्रार्थी मैं, लखन-रघुनन्दन!सुवर्ण मृग देख मोह माही भटकी,पलभर कंचन-कंचुकी में अटकी!दशानन-साधुरूप में सुनी विनती!लक्ष्मण-रेखा लाँघ कीनी गलती,निर्मल, स्फटिक जल सी मैं पाव...
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