माँ के लिए क्या लिखूं मैं,माँ की ही लिखावट हूँ मैं।
माँ के गुणगान क्या करूँ मैं,
माँ की ही खिलखिलाहट हूँ मैं।।
सपनों का नीरव नभ है माँ।
भंवरों का मधु गुंजारव है माँ।
ममता का शामियाना हैं माँ।
दुआओं सुधारस घट हैं माँ।।
सागर की गहराई है माँ।
आशा की अंगड़ाई है माँ।
कलियों की मुस्कान है माँ।
कुन्दन का आभूषण है माँ।।
नयन-झील की तरंग है माँ।
सतह पर तैरता अक्स है माँ।
चेहरे की पीर पढ़ लेती माँ।
गालों के अश्क़ पोछती माँ।।
धड़कन में बसती प्यारी माँ।
हर क्रन्दन की साक्षी है माँ।
आईना यथार्थ का है तू मेरा
हूबहूँ छवि-बिम्ब मैं तेरा।।
देवता नमन करें जिसको।
कहते जननी, जन्मभूमि उसको।
कुक्षी में पलता जीव अकिंचन है।
सृष्टि का अदभुत आलिंगन है।।
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।