महामंगला छंद..
नमन माँ शारदे!🙏🙏
महामंगला छंद।
गीत।

शीर्षक : भरतार!

रह जाती है सजन, मन की मन में बात।
बैरी सारी प्रकृति, बैरी मधुमय रात।।

चला गाँव से किशन, लेकर सपने आज, 
बेबस निरखे शहर,  भूखा ढूंढे काज।
मज़बूरी थी बहुत, छोड़ा परिजन साथ।
खेत जोत भी सतत, रहता खाली हाथ।।

दर्द हुआ है मुखर, अश्कों की बरसात।
बैरी सारी प्रकृति, बैरी मधुमय रात।।

खुली शुद्ध थी पवन, नदियाँ बहती धार।
छूटा उसका वतन, बढ़ता वह मन मार।
काम-काज का समय, बुरा वक़्त है मान।
भू-पति से बन श्रमिक,  रोजी-रोटी गान।।

आई है ऋतु शरद, चिढ़ा रहे जज़्बात।
बैरी सारी प्रकृति, बैरी मधुमय रात।।

बस्ती-ढाणी दुखद, यही कहानी जाण।
'खोली' में कर शयन, कर भविष्य निर्माण।
प्राणवायु यह महज, अय्याशी की चीज।
यह अमीर को सुलभ, दीन-दुखी की खीज।।

खिले गुलाबी कमल, सरवर-झील-प्रपात।
बैरी सारी प्रकृति, बैरी मधुमय रात।।

बापू खाँसे अथक, दुखती माँ की  पीठ।
बिन अनुशासन कड़क, बच्चें अतिशय ढीठ।।
लक्ष्मी घर की विकल, रोज सहे खुद वार।
पल-पल सहती विपद,  नित तानों की मार।।

लाल शराबी अधर, मय का प्याला गात।
बैरी सारी प्रकृति, बैरी मधुमय रात।।

बैरी सारा जगत, दुश्मन घर-संसार।
क्यों देशावर सजन, ज़ा भूले भरतार।
तुम बिन भडकी अगन, युग-युग लंबी रैन।
मात-पिता के सजल, देखूं कैसे नैन।।

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।

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