विषय- कोहरा बनाम कोहराम
विधा- संवाद
निर्मला अपने बेटे आलेख को उठाते हुए: अरे बेटा आलेख जल्दी उठो,स्कूल जाने में देर हो
जाएगी
आलेख: झुंझलाहट में माॅं क्या तुम भी सुबह सुबह , तुम मुझे सोने ही नहीं देती, चैन से रहने ही नहीं देती, जीने नहीं देती।
मुॅंहफट निर्मला: स्कूल कौन, मैं जाऊंगी या तेरे पिताजी, तू जिंदगी में आगे नहीं बढ़ सकता।
बाहर हाल में से रमेश की माॅं आलेख की दादी : सोने भी दो न ,बच्चे को एक दिन बच्चा स्कूल नहीं जाएगा तो कौन-सा आसमान टूट पड़ेगा, बाहर देखो कितना #कोहरा है ।
निर्मला के पति रमेश : माॅं सही ही तो कह रही है
आलेख एक दिन स्कूल नहीं जाएगा तो क्या फर्क पड़ेगा, और मुझे गाड़ी चलाने में भी दिक्कत होगी, बाहर घना कोहरा है।
निर्मला:तुम भी दिन दिन आलसी बन रहे हो!!!
रमेश हंसते हुए:तुम क्यों बच्चे पर और मुझ पर ज़ुल्म कर रही हो ,आज सोने भी दो उसे, मेरा भी मन नहीं कर रहा गाड़ी चलाने का।
कितनी ठंड है , ठंड में बच्चों को नींद भी बहुत आती है।
निर्मला झल्ला कर : अरे तुम और तुम्हारी माॅं सब एक जैसे ही हो , तुम्हारा खानदान आलसी और बेटे आलेख को आलसी बनाने में आप दोनों का हाथ है ।
रमेश: निर्मला अरे तुम खामखां नाराज हो रही हो , तुम सहज क्यों नहीं बनती,हर बात में झुंझलाहट सेहत के लिए अच्छी नहीं।
रमेश रुक कर :और देखो आलेख अच्छा ही पढ़ता है और अव्वल तो आता है और क्या चाहिए तुम्हें, कभी एक दिन स्कूल न भी गया तो कौन-सा पहाड़ टूटेगा।
निर्मला:मुॅंह फूला लेती है और तुम जानो , तुम्हारी माॅं जाने, तुम्हीं पालों बच्चे को मां बेटे मिल कर!!!
रमेश : जिद्द के आगे झुक जाता है , निर्मला को कैसे भी मना लेता है , आलेख को तैयार कर स्कूल ले जाता है,
(रास्ते में कोहरे की वजह से मार्ग बहुत अवरोधित हुआ था, मतलब की रास्ता वाहनों से जाम था
गाड़ी को मार भी लगती है , )
(बाप बेटे किसी तरह स्कूल पहुंच जाते हैं , देखें तो स्कूल बंद था
स्कूल वालों ने सात दिन की छुट्टी की घोषणा कर रखी थी, निर्मला ने फोन में आये मैसेज को पढ़ा नहीं। मैसेज निर्मला के फोन में ही आते थे।)
बड़ी मुश्किल से रमेश व आलेख वापस घर आए:
(निर्मला जब तक मैसेज पढ़ तो चुकि थी , पर बौखलाहट में वो रमेश को फोन नहीं कर सकी,
सोचा कि वापस तो आयेंगे और कहां जाएंगे।)
(निर्मला: मुॅंह झेंप कर छोटा हुआ था), पर बात बनाते हुए, क्यों वापस आ गये क्या स्कूल बंद है क्या...?ये स्कूल वाले भी.. , कम से कम मैसेज तो देना चाहिए,
रमेश: देखो मैसेज तो ,दिया होगा तूने पढ़ा नहीं होगा।
निर्मला: अब जाने दो, बात को पलटने हुए , रमेश से: आज तुम आफिस मत जाना, बाहर घना #कोहरा है , आज हम सब घर पर एक साथ ही रहेंगे। आज बाजरे की रोटी और पकौड़ी वाली कढ़ी बनाऊंगी, माजी को भी पसंद है । थोड़े गोंद के लड्डू भी बनवा लेती हूॅं , माजी को पास बिठाकर।
निर्मला:अब सात दिन की छुट्टी भी है
आलेख: चुटकी लेते हुए क्या बात है आज तो मम्मी बहुत खुश नजर आ रही है !!!
सचेत रमेश: तुम्हें कैसे पता, सात दिन की छुट्टी का?
मैसेज में लिखा था क्या ?
निर्मला: कैसे पढ़ती,कोहरे में कुछ दिख नहीं रहा है ,
रमेश:कोहरा बाहर है घर में नहीं , ट्यूब लाईट का प्रकाश तो है ,वो कोहरे में भी इतना ही रहता है ।
बात आगे न बढ़ा कर सब मन ही मन हंस रहे थे । माहौल खुशनुमा कर दिया
आलेख ने , कोहरे के बदले कोहराम न मचे उसके लिए आलेख ने घर में छाये कोहरे को अपने अंदाज में दूर किया।
संवाद लेखन: अशोक दोशी