उलझा मधु आसक्त, प्रेम अमिरस प्राशन में|
जीवन लीला ध्वस्त, मोह-मद-माया-स्थल में ||1||
गिरधर है मम प्राण, सहूँ क्यों विछोह प्रियतम|
मीरा के प्रभु जाण, करूँ क्यों विरोध हरदम||2||
दशरथनन्दन राम, तात वर राखी लज्जा|
कौशल्यासुत नाम, सिया वर मोहे ले जा ||3||
केवट बोले देव, लगा दो नैया तीरे|
दीनदयाला खेव, नाव को धीरे-धीरे ||4||
लंकापति मन खोट, साधु फैलाये झोली|
सीता हर, दे चोट, पतित जलाये होली||5||
विजया दशमी पर्व, मनाओ मंगल बेला|
विजयश्री पर गर्व, लगाओ चंपा, बेला ||6||
सिद्धारथ का लाल, वीर कुल राजदुलारा|
पुण्यात्मा सी चाल, त्याग, तप, संयम धारा ||7||
भव-भव तारणहार, मोक्ष पथगामी जिनवर|
आओ पालनहार, देशना देने प्रभुवर ||8||
खिलने दो मधु मास, प्रीत की यौवन हाला|
पतझड़ में लघु आस, जीत की अनुपम शाला ||9||
गम की आई रात, बहा आँखों से पानी |
जारी थी बरसात, ढूंढ पाओ न निशानी ||10||
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र!