सकारात्मक सोच.... विषय: कैसे बनाते है अपनी ज़िन्दगी को सकारात्मक....

पूरा सप्ताह अस्पताल में बिताने के बाद मैं घर लौटी थी। भोर में ही आँख खुल गई थी। कोयल जोर-जोर से कुहूँक रही थी और नीरवता का भंग कर रही थी। हौले-हौले अँधेरा छट रहा था और सूरज की सुनहरी रश्मियाँ खिड़की में लगे पौधों की कोमल पत्तियों को चूम रही थी! पंखुड़ियों ने अपने आवरण फेंक दिए थे। वह खिल-खिला रहीं थी और उनका मुख-मण्डल दमक रहा था। 

मैंने खिड़की से नीचे झाँक कर देखा। कल तक खूंट सा खड़ा बादाम का पेड़ का कटा तना कत्थई नव-पल्लव का श्रुँगार किए मुस्कुरा रहा था। आसपास चार-पांच गौरैय्या फुदक-फुदककर दाना चुग रही थी और पास ही मटके के टुकड़े में पड़े पानी को पी कर, अपने मृदुल परों को फड़फड़ा कर उछल-कूद कर रही थी। खिड़की की जाली का सहारा लेकर आसमान को निहारता मनी-प्लांट कहकहें लगा रहा था। नीले आसमान में सफेद रुई के फाहों से बादल अपनी मस्ती में तैर रहें थे।
प्रकृति का सुन्दर, मनमोहक रूप देख कर मैं अभिभूत थी मानों सभी मुझ पर हँस रहे थे और पूछ रहे थे,"नाम तो कुसुम है पर इतनी मुरझाई क्यों हो? रोज तो खुद को खिलाड़िन कह डिंगे मारती हो और संघर्ष के शुरुआत में ही हथियार डाल देती हो?"
मैं अन्तरमुख़ हो सोचने लगी। कितनी ममतामई है प्रकृति माँ! कितने घाँव सहती है पर अपनी जद्दोजहद जारी रखती है, कभी अपमान के घूंट पी कर, कभी मर्म पर घाँव सह कर तो कभी धरती में दफ़न हो कर लेकिन अपना धर्म-कर्म नहीं छोड़ती! कितना अनुशासन, कितना गरिमामय व्यवहार, कितनी जीवट! क्यों मैं नहीं सीख पाई यह पाठ प्रकृति से? क्यों टूट कर बैठ गई मैं हताश-निराश हो कर?
मन-मस्तिष्क स्वयं से प्रश्न कर रहा था और स्वयं को ही चुनौती दे रहा था! अवरोधों की स्पर्धा को जीत, विजयश्री की वरमाला पहन तिरंगा ओढ पोडियम पर सीना तान खड़ी रहने का सपना देखने वाली इक जिद्दी खिलाडिन इतनी जल्दी ज़िन्दगी से हार कैसे मान गई?
मैं एक ओर स्वयं को धिक्कार रही थी तो दूसरी ओर सारे डॉक्टर्स की मेरे ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करने की जद्दोजहद को याद कर मन ही मन मुस्कुरा रही थी। 

ईश्वर की सुन्दर नेमत है ज़िन्दगी, क्यों न उसे बढ़-चढ़ कर, उत्सव मना कर बिताएं? किसे फुर्सत है इस जहाँ में आपके आँसू गिनने की! क्यों न हम सिर्फ औरों के लिए ही नहीं अपने लिए भी जिएं। अपनी पसंद का खाना खाएं, अपनी पसंद के गीत गुनगुनाएँ, अपनी पसंद का काम करें, किसी के दुःख-दर्द को कम करने में योगदान दें, उम्र की ढलान पर अपने अनुभवों को बाँट कर औरों को सचेत करें और किसी का भी इंतज़ार किए बिना खुल कर अपनी अभिव्यक्ति को हर उपलब्ध पटल पर अपने लेखन-चिंतन के माध्यम से अभिव्यक्त करें!

सकारात्मकता की ओर ले जाती यहीं वह सोच है जिसने मुझे प्रकृति माँ का सन्देश समझाया, जीने का win-win फंडा बताया और दवाईयों के भंवर से बाहर निकाल कर खुद को अनुशासित कर सकारात्मकता से जीवन जीने का मन्त्र दिया मानों चिंतामणि रत्न!

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
इस पर लोग क्या कह रहे हैं
  • बहुत सुन्दर ढंग से व्यक्त किया गया और एक जीवंत सामाजिक संदेश बहुत ही सुन्दर ढंग से व्यक्त किया गया है। आपने इस पोस्ट के माध्यम से एक जीवंत सामाजिक संदेश दिया है
  • बेहद खूबसूरत शब्दालंकारों से सुसज्जित आलेख आपका प्रेरणादायक है
  • वाह! बहुत सुन्दर
  • वाह खूब! ❤️🙏❤️🙏❤️🙏❤️
  • बोहोत अछा पोस्ट है |
  • वाह! सुन्दर