जीर्ण-शीर्ण पात
शीर्षक : जीर्ण-शीर्ण पात!

जीर्ण-शीर्ण पात नहीं, टूट कर बिखर जाऊ।
पवन के एक झोंके से, तितर-बितर हो जाऊ।
भले खूंट सा खड़ा हूँ, सृजन का समाधान हूँ।
धैर्य से भाग्य में लिखा, विधाता का विधान हूँ।।

फैली जड़ें गहरी मेरी, वसुंधरा के भू गर्भ में।
ढूंढती रहती नमी, पालन-पोषण सन्दर्भ में।
आशाओं का वटवृक्ष मैं , शतायु-अभिराम मैं।
जटाओं को फैला कर, देता सृजन विराम मैं।।

उम्र की ढलान पर, बढ़ता चिंता का बोझ रोज।
वक़्त की मार सह, चढ़ता चेहरे पे तेज-ओज।
लड़खड़ाते हैं पैर-गात , खुद्दारी नहीं शर्मिंदा है।
जल गएं हैं पीले पात, चिंगारी अभी जिन्दा है।।

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।

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