भाग १३
बहारों के मौसम में पतझड़ का नज़ारा देख किसी की भी हिम्मत दम तोड़ देती लेकिन वैदेही, यश , वज्र और विभा ने वक़्त की चुनौती को कड़ी चुनौती देते हुए आगे बढ़ने का प्रण कर लिया था...उन्हें विश्वास था एक दिन समय उन्हें झुक कर सलाम करेगा और वो अवरोधों की स्पर्धा को डंके की चोट पर जीत कर अपनी जिजीविषा, जीवट, जद्दोजहद और ज़िद से विजयश्री को खींच कर ले आयेंगे अपने पास!
वैदेही को सुबह-सुबह यश का सन्देश आया था .. वह चाहता था वज्र से मिलना.. वैदेही भी उसे मिस कर रही थी..उसने यश को कहा.. "प्लीज! थोड़ा इंतज़ार करो.. मैं वज्र से पूछ कर तुम्हें बताती हूँ.. कहीं उसकी आज डॉक्टर से अपॉइंटमेंट तो नहीं है न..."
वैदेही ने वज्र को कॉल किया.. कल सुबह माँ, दादा-दादी के जाने के बाद आबा का घर सुना-सुना हो गया था.. 'खाली दिमाग़, भूतों का घर...' वज्र नकारात्मक विचारों में घिर गया था तभी वैदेही का कॉल आया और सूर्य की सुनहरी किरणों से मन को धुंधलाता कुहासा छंट गया! वज्र यश और वैदेही के आने की बात सुनकर बहुत आनंदित हुआ और उनका इंतज़ार करने लगा..
वैदेही ने यश को कॉल कर दोपहर तीन बजे वज्र के यहाँ आने को कहा और वज्र को भी मेसेज कर दिया! माँ को भी अपने प्लान के बारे में बता दिया था उसने...दुर्घटना के बाद यश पहली बार वज्र को मिल रहा था... यश के आने से पहले ही वैदेही वज्र के घर पहुँच चुकी थी..
आबा आज बहुत खुश थे.. डॉक्टर ने वज्र को चलने और छोटे-मोटे काम खुद करने को कहा था! खाने में चीनी और नमक की मात्रा को कम से कम लेने की सलाह दी थी! वसायुक्त पदार्थ कम से कम खाने तथा फाइबर युक्त श्री अन्न तथा सब्जी-फल की मात्रा भोजन में बढ़ाने को कहा था! डॉक्टर वज्र के हार्ट ट्रांसप्लांट के ऑपरेशन के बाद की प्रगति से बहुत उत्साहित थे...
वैसे वज्र पहले से ही अनुशासन प्रिय तथा संयमी था... पहले से ही वह स्वास्थ्य के बारे में बहुत सतर्क था! कई दिनों बाद आज अपने दोनों मित्रों को मिलने का मौका उसे मिला था!
वैदेही आबा से बात कर रही थी तभी उसकी नज़र यश पर पड़ी... धीरे-धीरे वह बंगले की ऒर बढ़ रहा था तभी वैदेही उसे लेने सीढ़ियों से नीचे उतरी.. को साथ लेकर वह आबा की तरफ बढ़ी और उनके चरण छूँ कर एक तरफ ख़ड़ी हो गई! आबा ने यश को गले लगा कर 'जादू की झप्पी' दी और तीनों वज्र के कमरे की तरफ जाने लगे...
वज्र चाहता था दोनों को झप्पी देना लेकिन उसने संयम से काम लिया और दोनों का हाथ पकड़ कर कमरे की तरफ बढ़ने लगा! आबा की आँखें नम थी.. दोस्तों का यह अद्भुत मिलन देख वो भी भावुक हो गए और अन्नपूर्णा को आवाज़ देते-देते रसोईघर की तरफ चल पड़े..अन्नपूर्णा आबा के गाँव के घर में खेलते-कूदते ही बड़ी हुई थी! उसका भाई भी आबा के यहाँ काम करते-करते ही पढ़- लिख कर बड़ा हुआ था... गाँव में घर में काम करने वाले भी अपने मालिक के परिवार का अटूट हिस्सा बन जाते थे ... वो परिवार के हर दुःख में, सुख में शामिल होते थे जब से आबा का मुम्बई आना-ज़ाना शुरू हुआ, वो आबा के साथ ही रहते, उनको हर काम में मदद करने में तत्पर रहते!
थोड़े समय बाद अन्नपूर्णा फलों से सजी तश्तरी लेकर आई..और तीनों बातों में खो गए..
यश को धीरे-धीरे चलते देख वज्र को अंदाजा आ गया था.. कुछ तो गड़बड़ है यार! आखिर उसने पूछ ही लिया... "यश! अपने दोस्त से असलियत छुपायेगा तू ? क्या बात है? " यश मुस्कुराने लगा.." कुछ नहीं यार! यें 'जयपुर फुट' वालों ने मुझे ही चुन लिया यार....ट्रायल के लिए... नया प्रोडक्ट क्या बनाया, मुझ पर ही ट्राय कर दिया! ईश्वर का शुक्रिया है यार...हम दोस्त आज एक दूसरे से मिल रहें है.. अपना दर्द-खुशियाँ बाँट रहें हैं.. बाकि मैंने वक़्त को कह दिया है यार! तुमने गलत लोगों से पंगा ले लिया बेटा! तू जितना प्रहार करेगा, जितना तपायेगा, हम यार-दोस्त.. कुंदन बन कर और-और निखरेंगे... आज बहुत खुश हैं न तू अपनी फतह पर ? कल हमसे माफ़ी मांगेगा तू ! कहेगा.. तुम जीत गए बन्दों... मैं हार गया.. दे ताली... तीनों ने हाथ से हाथ मिलाया और बोल पड़े, "हिप.. हिप.. हुर्रये...'
वज्र यश के जज्बे को देखता ही रह गया.. इतने दिन मैं इसके साथ रहा.. क्यों नहीं सीखी मैंने यह जिंदादिली? वज्र खुद को धिक्कार रहा था! वैदेही नि:शब्द दोनों को निहार रही थी.. वक़्त की जोरदार चपराक पड़ने के बाद भी उनका हौसला न तो जरा भी डगमगाया था न टूटा था...बल्कि और ज्यादा मजबूत, फौलाद सा बन गया था....
वज्र का मन असीम ऊर्जा से भर गया था! अन्नपूर्णा गरमागरम चाय और बिस्किट लेकर आई और सभी पुरानी यादों में खो गएँ... वैदेही ने इस हप्ते से कॉलेज जाने की बात कही तो सभी के दिल कॉलेज के विशाल प्रांगण में पहुँच गएँ....यादों के परिंदों ने कौलेज के मुख्य द्वार पर खड़े गुलमोहर पर डेरा डाल दिया था। सभी एक ही जगह सुस्ताएँ थे ताकि प्राची की आहट मिलते ही सभी चहचहाहट से अपने मित्रों को जगाकर एक साथ उड़ान भर सकें!
अमृत महोत्सव मना रहें उनके कॉलेज के मैदान में स्थितप्रज्ञ से खड़े बड़े-बड़े वटवृक्ष, नीम-पीपल के पेड़ उन्हें बुला रहें थे...पेड़ों की ओट से झाँकता सूरज उन्हें ढूंढ़ रहा था और परिंदों की मधुर चहचहाहट उन्हें निमंत्रण दे रही थी! कॉलेज के मुख्य द्वार पर सजी लताएँ उनका इंतज़ार कर रही थी... आखिर महाविद्यालय के मेधावी छात्र थे वो... उनके दुर्घटना की ख़बर सभी नामचीन अख़बारों की सुर्खियां बन चुकी थी! सभी को इंतज़ार था उनके स्वस्थ हो कर कक्षा में लौटने का!
यह करिश्मा शायद इन्ही शुभचिंतकों की वजह से ही हुआ था...तीनों सपनों की तिलिस्मि दुनिया में खो गएँ थे .. दर्द, निराशा, अनिश्चितता का दौर ख़त्म हो चूका था और अमावस की रात के बाद नई भोर का आगमन निश्चित था!
एक दीये से दूसरा, दूसरे से तीसरा और तीसरे से चौथा दीया प्रज्वलित हो कर चारों दीयें आँधियों का मुकाबला करने के लिए सुसज्जित हो चूके थे! अँधेरा घना था पर इन नन्हें मिट्टी के दीयों का हौसला अडिग चट्टान सा था... उन्हें बुझने का बिल्कुल ड़र नहीं था... मौत से डर कर क्या जंग लड़ी ज़ा सकती हैं? आखिर अभी-अभी तो मौत की आँखों में आँखें डाल लौटे थे चारों...
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र!
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