ए प्यार ही तो ज़िन्दगी... भाग २६
भाग २६

बाबा शकुनि के यहाँ जाकर मदारी और बंदरिया ने ज्ञान तो पा लिया था लेकिन बेचारे चाँदी का कटोरा और चाँदी की तश्तरी बाबा के चढ़ावे के लिए कहाँ से ला पाते? खाली जेब वालों को बाबा के यहाँ भी स्थान कहाँ मिलता हैं रे बाबा? यहाँ भी लक्ष्मीपतियों ने कब्ज़ा कर रक्खा हैं! धर्म के नाम पर बाबाओं की दुकाने सजी हैं...

बेचारा भोला मदारी निराश हो कर अपनी नटखट बन्दरिया के साथ घर लौट गया बार-बार अपनी टूटी-फूटी किस्मत को कोसते हुएं...बंदरिया भी अपने मालिक की मनोदशा को पहचान गई थी और उछलकुद बंद कर शरीफ बच्चे सी माफारी के पीछे-पीछे चल रही थी!
मदारी को उदास देख उसकी पत्नी शकु से रहा नहीं गया! उसने आखिर पूछ ही लिया, " क्या हुआ? बाबा ने दुत्कार कर निकाल दिया तुम्हें और बंदरिया को? तुम्हारे मिट्टी से सना चेहरा और फटे-पुराने कपडे देख कर?"
"नहीं रे पगली! मैंने और बंदरिया ने बजरंग बली के नाम का टीका लगा वहाँ भी तों सारे भक्तों को खेल दिखाया था न! भक्तों ने दिया हमारा चढ़ावा भी बाबा ने ही रक्खा था..जानती हैं शकु! ये बाबा भी चाँदी की तश्तरी और कटोरे में नाश्ता करते हैं... हम गरीबों के जैसा नहीं! सबको कहते हैं मोह-माया छोड़ दो और खुद माया के पीछे ही भागते हैं... 
अब मदारी की बीबी का दिमाग़ सटक गया!  वह बोल पड़ी.. "इतनी बार समझाया हैं तुम्हें .. यहाँ फ्री में कुछ नहीं मिलता! मेरी मैडम बड़ी दयालु हैं, बहुत पढ़ी-लिखी हैं.. कल मैं उससे पुछूंगी... अमरत्व का राज! भूल जाओ इस बाबा शकुनि को.. धन के लोभी को! 
मदारी असहाय सा अपनी शकु की बात को मान गया.. और रास्ता भी क्या बचा था उसके पास ? दोनों थके-हारे झोपड़ी में बिछी चटाई पर सो गएँ और बंदरिया बाहर चांदनी में.. 
नाटक में विभा को मदारी की पत्नी का रोल करना था और वज्र को डॉक्टर का.. आगे के संवाद भी याद करने थे विभा को.. वज्र तो उस दिन भी तैयार हो कर आया था पर अभी तक उसका नंबर आया ही नहीं था...
कॉलेज में यश को आज अपने प्रोजेक्ट का प्रेजेंटेशन देना था! उसकी कक्षा के तीन छात्रों की टीम  तैयार थी! यश ने अपने प्रोजेक्ट को समझाने के लिए चार्ट बनायें थे.. उनमें कई बातें समझाने के लिए ग्राफिक्स का उपयोग किया गया था और जानकारी का विश्लेषण करने के लिए ग्राफ का! 
कॉलेज के विशाल हॉल में यह प्रेजेंटेशन था! यश टीम लीडर था.. धाराप्रवाह अंग्रेजी बोलने में उसका कोई सानी 
नहीं था! प्रेजेंटेशन को देखने कुछ नामी-गिरामी प्रतिष्ठानों के मुखिया भी आएं हुएं थे! यश माईक पर विश्लेषण कर रहा था और उसके दोनों साथी ब्लैक बोर्ड पर, चार्ट पर डाटा को छड़ी से चिन्हित कर दिखा रहें थे! चित्र-लेख , ग्राफ और विश्लेषण के आधार पर समझाया गया विषय छात्रों तथा श्रोताओं के मन-मस्तिष्क में आसानी से पहुँच बना रहा था! यश की बुलन्द आवाज़, आकर्षक व्यक्तिमत्व और विषय का गहरा अध्ययन उसके प्रस्तुतिकरण में झलक रहा था और उसके साथी उस पर चार चाँद लगा रहें थे!
प्रेजेंटेशन के सम्पन्न होने पर सभी ने तालियों से उनका अभिनन्दन किया! यश के जिगर और जीवट को देख सभी मन्त्रमुग्ध थे! विभा, वज्र और वैदेही की खुशियों का कोई ठिकाना ही नहीं था! विभा ने कई महत्वपूर्ण लम्हों को मोबाइल में कैद कर लिया था! 
सभी ऑडिटोरियम के बाहर यश का इंतज़ार कर रहें थे और यश था कि बड़ी-बड़ी हस्तियों से घिरा हुआ था! महाविद्यालय के नवोदितों के लिए तो वह आइकॉन बन चूका था! अपने साथियों का अभिनन्दन और धन्यवाद कर यश बाहर निकल आया... सभी ने उसे बधाईयाँ दी और उसे घेर कर, गले लगा कर उसकी हौसलाअफजाई की! पतझड़ में शाख से टूटे पत्तों सा वह असहाय हो हवा के साथ 'हवा' नहीं हुआ था बल्कि खूंट सा अटल खड़ा रह कर वसंत का इंतज़ार कर रहा था.. वक़्त के थपेड़ों को गज़ब की सहनशीलता से सह कर वह खुद को फिर से साबित कर रहा था ...
यह उसके अटूट आत्मविश्वास का ही कमाल था कि फिर नई किसलय ने जीवन को नई चमक प्रदान की थी..
विभा गुलाब के फूलों का गुलदस्ता लेकर वैदेही और वज्र के साथ खड़ी थी! आज पहली बार वह बहुत भावुक हो गई थी... वज्र ने उसे संभाला! कभी-कभी, किसी खास पल में व्यक्ति बहुत कमजोर हो जाता हैं.. बस! आज विभा का वहीं हाल था! यश चेहरा पढ़ने के हुनर में माहिर था! संवेदनाओं के स्पंदन को वह भाँप लेता था.. विभा के हाथ से गुलदस्ता लेकर उसने प्यार से तीनों को जादू की झप्पी दी.. मानों अपनी भावनाओं को वह स्पर्श से विद्युत सा अपने दोस्तों में संचारित कर रहा था !
आज यश के यहाँ प्रैक्टिस थी लेकिन सभी थके हुए थे... खास कर यश! उसे आराम की जरुरत थी! प्रैक्टिस अगले दिन रखी गई और सभी अपने-अपने घर लौट गएँ!
यश को छोड़ विभा घर की तरफ बढ़ गई...आज उसे कुछ अधूरा-अधूरा सा लग रहा था। मन के आकाश में कजरारे बादलों ने अचानक डेरा डाल दिया था और उदासीनता का घना कोहरा ग्रहण सा आसमान में छा गया था।
न जाने क्यों, विभा आज कुछ थकान सी महसूस कर रही थी..उसने दरवाजा खोला और सीधी पलंग पर पहुंड गई... रोज की तरह न तो उसने कपडे बदले न हाथ-मुँह धोया! पलंग पर लगी रेशमी चद्दर की सलवटें उसे काँटों सी चुभ रही थी और खिड़की से आ रही सूरज की किरणे मानों आग उगल रही थी..पत्तों की सरसराहट उसे चिढ़ा रही थी और परिंदों की इक्का-दुक्का उपस्थिति उसे बेचैन करने के लिए काफ़ी थी। यादों के मखमली पल न जानें क्यों आज शूल से चुभ रहें थे!  जब से उसने यश को मान्यवरों को अभिवादन करते और उनकी शुभकामनाओं को मुस्कुरा कर स्वीकार करते देखा, यादों के दो राजहंस उसे शांत जलाशय में तैरते हुएँ दिखाई देने लगे... कुछ ज्यादा समय नहीं बीता था उन्हें अंतर-महाविद्यालयीन बैडमिंटन मिक्स डबल्स स्पर्धा में विजेता का कप जीते हुएं.. वह पल और आज का पल.. फर्क सिर्फ इतना था कि उस दिन वो दोनों साथ थे.. सभी के गुलदस्ते, शुभकामनाएँ स्वीकार करने के लिए और आज.. आज यश स्टेज पर था और वह  गुलदस्ता लिए...बाहर...किस्मत की लकीरें भी कभी-कभी धोका दे जाती हैं। होठों के पास आया जाम हाथ से गिर जाता हैं और हम रीते के रीते रह जाते हैं।

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई |
अगला भाग अगले अंक में...


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