रिश्तें नफरत की यह आँधी, लील गई सब रिश्तों को।
अपनापन स्नेहिल बिसराया, बांटा नेह परायों को।
नहीं आपसी भाईचारा, प्रेमिल सी निर्मल धारा~
मानव मन धर्म भ्रष्ट स्वार्थी, भूलाया अपनी संस्कृति को।

चंचल जैन
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