सहज नियति की मंजूरी से ,
ग्रह गतिमान होते हैं ।
कालचक्र कुदरत अधीन सभी,
निश्चित कर्म पिरोते हैं ।।
कुछ न कुछ घटनाओं के पिछे,
कारण जरूर होते हैं ।
करते रहो शुभ कर्म अपना ,
फल पाते जो बोते हैं।।
रहें सदा अलिप्त भावों में ,
घटित घटना निहारोगे।
विचलित होना नहीं कभी भी
कभी न मन से हारोगे।।
रखें सदा मन को संतोषी
सुख सुकून यदि पाना है
पाले न अपेक्षाएं अनहद
निष्ठा हमें निभाना है ।।
स्वरचित: अशोक दोशी