शीर्षक : पराया धन!
पहले सावन की पहली बारीश!
प्रकृति ने रची ये कैसी साजिश?
यौवन-ज्वार में दहका तन-मन।
रिमझिम बौछारों से भीगा मधुवन।
प्रियतम मोह में उलझा आँचल,
बाबुल द्वार की खनके साँकल।
परिणीता-पीहर प्रथम पदार्पण,
नैहर से ले आया वीरा निमंत्रण।।
मुंढेर पर बैठ टुहुंके मोर बावरा,
खोले दिल की पोल कागा कारा।
खेतों में हलधर बोएं गेहूं-बाजरा।
जीवनदायिनी हरी-भरी वसुंधरा।।
सावन की बौछारों में बरसे नयना।
गौरवान्वित करूँ दो कुल का मिलना।
मात-तात की आँखों का मैं कजरा।
कैसे भूलूं विदाई में भीगा अचरा?
चहके कोयल देख ऋतु सावन की।
झूला झूले हवा संग डाल सहजन की।
बूँद-बूँद बरसे बदरी, बिजुरी तड़की।
पराया धन सौंप क्यों छाती धड़की?
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।