नादान परिंदा! नादान परिंदा कहे सहचरी से ......
जीवनसाथी! कितनी करीब हो दिल के ?
क्या आओगी मेरे साथ आसमान छूने?
नील गगन में दीवानों सी उड़ान भरने?
काला तिल लगे बादलों की ठूठी छूने?
कज़रारे घनों संग लुका-छुपी खेलने?
पवन संग इंद्रधनुष पर झूला झूलने?
बिजुरी संग अखियाँ लड़ा लुका-छिपी खेलने?

डाल पर बैठी पक्षिणी ने ली अंगड़ाई!
जीवनसाथी को देख थोड़ी सकुचाई!
फ़ड़फड़ा परों को बुँदे गिराई धरा पर,
बोली पिया! राह ताक रहे नन्हे घर पर!
पक्षिणी दाना लिए चली मासूमों की ओर!
सूरज को विदा कर चली गतंव्य की ओर !
श्रुँगार, सम्भोग, मस्ती के पल बीते-बीते,
यौवन के सपन सुहाने अब थे रीते-रीते!

उतरदायित्व की रात लम्बी, लम्बी है डगर, 
दुनियादारी में उलझे परिंदों को चूजों की फिकर!
मखमली पंखो की छाँव में दी नमी प्यार की!
दो परिंदों के घरौंदें में फले-फूले पौध प्रीत की!

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुंबई, महाराष्ट्र |
इस पर लोग क्या कह रहे हैं