ये प्यार ही तो ज़िन्दगी... भाग ७६
भाग ७६

वज्र के दादाजी भास्कर राव जी का देहांत क्या हुआ आबा की सारी बिछी-बिछाई व्यापार की चौपट बिखर गई थी। अब तक भास्कर राव जी गाँव का सारा कारोबार सँभालते थे तो आबा को वहाँ की बिल्कुल चिंता नहीं थी। प्रतिभा जी को उनका बहुत सहारा था। अब उनकी माताजी और पत्नी दोनों ही अकेली पड गई थी। वैसे तो प्रतिभा जी के पीहरवाले पास ही थे लेकिन यह तो एक-दो दिन की नहीं, हर रोज की समस्या थी। उसका तोड़ तो आबा को ही ढूंढना था।

अपनी पत्नी और आई से विचार-विमर्श कर उन्होंने आखिर मार्ग ढूंढ़ ही निकाला। आबा विनायक राव जी की आई ने मुम्बई आने का फैसला किया और गाँव में आबा और प्रतिभा जी घर और कारोबार संभालेंगे यह निश्चित हुआ। यहाँ का कारोबार अब वज्र को सौपने का आबा ने निर्णय लिया और उस पर अमल भी शुरु हो गया था। आबा बिच-बिच में आकार व्यापार का लेखा-जोखा लेते रहेंगे यह आबा ने मन में ठान लिया था। वैसे वज्र को मदद करने के लिए अब वैदेही भी थी और जानकी जी तो सदैव उन्हें सहायता करने तत्पर रहती क्योंकि आबा भी उन्हें सँभालते, उनकी खैर-ख़बर लेते रहते थे।

वज्र कॉलेज से लौटा तो उसने आजी को देखा। आजी सोफा पर बैठ कर रुई की बाती बना रही थी और आबा सामने बैठ कर पेपर पढ़ रहे थे।  जैसे वज्र ने कहा, " नमस्कार करतो आजी! " वह बोल पड़ी, " औक्षवंत हो पोरा!" और माथे पर हाथ रख बालों को उंगलियों से सहलाने लगी। आजोबा के जाने के बाद आजी को अकेलापन कांटने को दौड़ रहा था लेकीन वज्र को देख उसकी पाँखें खिल गई! वह कुछ पल वज्र को निहारती रही मानों उसके सामने युवा, राजसी रूप-रंग वाले, छैल- छबिले आजोबा ही खड़े हो!  वज्र आजोबा का ही अक्स था! जीवन के साठ वसंत साथ-साथ देख चुकी लक्ष्मीबाई कैसे आसानी से भूल पाती उन्हें? जाते-जाते भी आजोबा वज्र को मिलने को बेताब थे। 

लक्ष्मीबाई बोल पड़ी, " पोरा! थकलास न ?
बेटा! जाओ! हाथ पैर धोकर आओ! सब तुम्हारा ही इंतज़ार कर रहे हैं भोजन के लिए। "

कितने दिनों बाद आजी की ममताभरी बात सुनकर वज्र भावुक हो गया। आजोबा के बाद आजी ही तो थी जिसके पल्लू के नीचे छुप-छुप कर वह बड़ा हुआ था। संयुक्त परिवार में माता-पिता तो काम में लगे रहते हैं, बच्चें दादा- दादी, नाना-नानी की गोद में उछलकूद कर, छुपा-छुपी खेल ही तो बढ़े होते हैं। कितनी भी मस्ती क्यों न की हो मजाल हैं कि कोई उन्हें डांट दे। बच्चें दादा-दादी के मिट्टी के बर्तन में जमाया हुआ मलाईदार दही से निकला माखन होता हैं, जिसकी कीमत उनके अपने बच्चे से भी ज्यादा होती हैं। 

वज्र की तो अब पांचों उंगलियाँ घी में थी। आजी को वज्र के सिवा कुछ दिखता ही नहीं था! 
अन्नपूर्णा पूछती, " आजी! जेवणात काय बनवू? आजी का एक ही जबाब, "वज्र ला काय आवडत.. ते बनव!
"आजी! जेवायला वाढू का... आजी का जबाब, " वज्र ला येऊ दे! 
अन्नपूर्णा आजी को दोपहर को पूछती," आजी! चहा ठेऊ का..उत्तर एक ही..."वज्र उठला का? 
आजी की सुई वज्र पर ही अटकी रहती! वहीं से शुरु, वहीं पर ख़त्म!

वज्र के लेकिन मज्जे ही मज्जे थे! बातूनी आजी से बातें करते-करते सूर्य कब अस्त होता, चाँद कब फलक पर मुस्कुराने लगता और आदित्य कब पृथ्वी पर ग़ुलाल उंडेलता, पता ही नहीं चलता। रात के छ: घण्टे छोड़ दो तो आजी का मुँह और हाथ साथ-साथ चलते ही रहते! अन्नपूर्णा और छोटू को भी बड़ा मज़ा आता। आजी की अस्सल गांवरान मराठी सुन दोनों खूब खुश होते! 

उम्र के इस पड़ाव पर जब चेहरे पर पुरानी दीवार पर पड़ी दरारों सी झुर्रियाँ दिखाई दे रही हो, आजोबा की तरह कई दाँत भी साथ छोड़ निकल चुके हो, लम्बे-घने बालों के लिए ब्राह्मी आँवला तेल लगाएं कहने वालों को फटकार कर अपने चाँदी से पतले बालों को दिखाती आजी को वज्र देखता तो उसकी जिंदादिली पर खूब मुस्कुराता!

आबा दादी-पोते को देखते और मन ही मन मुस्कुराते! अभी तो आबा को आएं चौबीस घण्टे भी नहीं हुएं थे,  सारा घर मोगरे की अगरबत्ती की सुगन्ध से महक रहा था। भोर में गायत्री मन्त्र के स्वर सुनाई देते और गोधूलि बेला में ' "शुभम् करोति कल्याणम् ...आरोग्यम् धन सम्पदा..."
ऐसा लग रहा था मानों आजी ने एक दिन में ही घर का पूरा कायापलट कर दिया है।

आजी को बागबानी का बहुत शौक था और उसका उन्हें अच्छा खासा ज्ञान भी था। नित नए किस्म के फूलों के पौधे लाना, उन्हें लगाना, उनकी देखभाल करना इसमें आजी निष्णात थी। एक जमाना था जब आजी आजोबा का दाहिना हाथ बन कर उन्हें खेतीबाड़ी, बागबानी के काम में मदद करती! वसंत में पौध पर मुस्कुरातें फूलों को देख फूले नहीं समाती! उसे भंवरे का गुंजन सुनना बहुत प्रिय था। 

सासवड की उपजाऊ काली मिट्टी में अंगूर की बागबानी भी बहुत अच्छी कमाई देती थी। अंगूर की छज्जे पर फैली लतिकाएँ और उस पर लटकते अंगूर के गुच्छे देख रेशमी सेज पर पहुडे बादशाह की अय्याशियों की कहानियाँ याद आती! 

कल आबा को सासवड लौटना था। प्रतिभा जी का दो- तीन बार फ़ोन आ चूका था। हमेशा भरे पुरे परिवार में रही प्रतिभा जी को अकेले रहने की आदत नहीं थी। गाँव की बड़ी-बड़ी हवेलीयां उन्हें खाने को दौड़ती थी । सालों बाद आबा और प्रतिभा की को साथ-साथ रहने का मौका मिल रहा था। दोनों शष्ठी पार कर चुके थे लेकिन प्यार अभी भी जवां था। आज भी पूनम का चाँद देख प्रतिभा जी को मधुचन्द्रमा की रात याद आती। 

आबा परिवार के मामले में बहुत ही संवेदनशील थे। आजतक उन्होंने कभी प्रतिभा जी से आवाज़ चढ़ा कर बात नहीं की थी और न प्रतिभा जी ने कभी आबा की बात को टाला था। दोनों के बीच एक-दूसरे को समझने की एक अलग ही विधा मौजूद थी जहाँ शब्द कम और आँखें ज्यादा बोलती थी। ख़ामोशी भी कभी-कभी शब्दों से ज्यादा मुखर हो जाती थी।

आजी को यह एहसास था। वो दोपहर से ही आबा के पीछे पड़ी थी । प्रतिभा जी उनके लिए बहु कम बेटी ज्यादा थी। 

सयुंक्त परिवार में युगल की मुलाकाते कम ही होती लेकिन जो होती हैं उनमें प्यार का खुमार चरम पर होता हैं। आखिर रोज-रोज कलाकंद भी खाओ तो उससे भी मन भर जाता हैं। संयुक्त परिवार में बढ़े-बूढ़े के लिहाज में टकराहट और तू-तू मैं-मैं भी टल जाती हैं लेकिन सयुंक्त परिवार में रहने के लिए गज़ब की समझदारी, त्याग-समर्पण की भावना औरों के लिए भी जीने का जज़्बा जरुरी होता हैं जो प्रतिभा जी में कूट-कूट कर भरा था।

वसंत की आहट से प्रकृति रोमांचित थी।
पेड़-पौधों पर नई कोंपले आ रही थी और पुरानी परिपक्व हो रही थी। परिंदों की चहचहाट सुन पत्तियाँ भी हवा में झूम रही थी। सारी सृष्टि में जीवनामृत घुला हुआ था और प्रकृति का रोम-रोम, पोर-पोर उल्हासित था।

विनायक राव जी तथा प्रतिभा जी के जीवन में भी अब वसंत ने दस्तक दे दी थी। बहुत दिनों के शिकवे-गिले दूर करने का मौका भी किस्मत ने दे दिया था। प्रतिभा जी को विनायक राव जी का बेसब्री से इंतज़ार था..

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
अगला भाग अगले अंक में.....


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