रासावलय छंद!
"बिखरते रिश्ते, सिमटते लोग"

बिखर रहे रिश्ते, सिमट रहे घर-द्वार।
मानवीय गुण का, बचा नहीं आधार।
मनुज मनुज का है, दुश्मन अति खूंखार।
विश्व पटल पर है, प्रिय झंडा बरदार।।

राम नाम मुँह में, अमन-शान्ति का गान।
हिंसा से करते, शुभारम्भ दे तान।
पंछी को देते, स्याह गगन अवमान।
स्वार्थ-दम्भ पोषित, मनुज महज पहचान।।

कृष्ण पक्ष, प्रभाव, ऊर्जा का विस्मरण।
सदाचार, समता, त्याग भाव का हरण।
चौदहवीं का शशि, तेज पुंज संवरण।
रिश्तों को देते, आभा नव संस्करण।।

तेरा है तुझको, अर्पण यह संसार।
फिर भी मनु करता, काया से क्यों प्यार।
शाश्वत सच है प्रभु, दाता तू सरदार।
मोक्ष-मुक्ति देना, तेरा ही अधिकार।।

वहम-अहम तोड़े, रिश्तों की बुनियाद।
मन की सुन, कर मन, मन से ही फरियाद।
पाने की चाहत, कुछ खोने के बाद।
दिल में रख समता, नित कर मनु संवाद।।

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।


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