चूमेंगे नभ, खयालों के परवाज़!
महफ़िल के बादशाह, बेताज!
यादों के कारवां का खुशनुमा आगाज़!
स्वप्न-विभावरी का चांद है सरताज!
सजा लो फूल-पत्तियों से डोली,
भीगे आँगन में मांडना-रंगोली!
मोतियों से गूंथ लो स्वप्न-वंदनवार,
जला दो! दीप हर दहलीज-द्वार!
जरासी आहट से छुई-मुई हुआ दिल!
सजी दिल की रौनक-ए-महफिल!
मनाएंगे जश्न यार संग हिल-मिल!
चांदनी रात में रोशन हुआ हर दिल!
जलती रहेगी शमा, विरह में रात-दिन!
पिघलेगा मोम सा तन-मन, संगीन!
पतंगे से प्रीत में पागल, नादां शमा!
खुद मिट बचाएगी, पतंगे का आसमां!
दर्द की इंतहा, सहने की लांघ दी सीमा!
वतन पे शहीद पतंगा... पतंगे पे कुर्बान हुई शमा!
दो जिस्म, एक जान! हुए साथ-साथ तन्हां!
दो तारें! चमक रहे अपने आसमां में तन्हां!
स्वरचित तथा मौलिक,
द्वारा कुसुम अशोक सुराणा, पवई, मुंबई, महाराष्ट्र