शीर्षक : फरियाद ... प्यारे गणेशजी से...
प्यारे गणेशजी!
भेरु का सादर प्रणाम!
चुन्नू,मुन्नू संग छुपा-छुपी खेलते-खेलते आपकी बहुत याद आ रही है! खुले आसमान तले बिखरी अनाज की फटी बोरियों पर कूदते-उछलते, पकड़ा-पकड़ी खेलते चूहों को देख लगा मानो विघ्नहर्ता, आपकी सवारी आ रही है! लगता है ये सब चूहे आपकी सेवा-चाकरी में ही लगे हैं ! तभी तो सब के सब आपके जैसे गोल-मटोल हैं! होंगे भी क्यों नहीं? बोरियां कुतर-कुतर कर रोज ही तो हजारों टन अनाज गप्प कर जाते हैं!
भगवानजी! आप को तो सब पता है! आपसे क्या छुपाऊँ? दिनभर मजदूरी कर कर, पत्थर उठाकर भी माँ मुझे आधी रोटी नहीं खिला पाती! कभी-कभी यहाँ से जमीन पर गिरा धान इकठ्ठा कर, पल्लू में बाँध, छुपा कर, ठेकेदार की पैनी नज़र से नजरें बचा कर माँ ले आती है घर और मुझे कभी गुंगरी, कभी रोटी बनाकर खिलाती है!भगवान जी! किसी को कहना मत! ये ठेकेदार 'अच्छा आदमी' नहीं है! वो माँ को डराता-धमकाता रहता है! भगवानजी! आप उसे कड़ी सजा क्यों नहीं देते?
भगवानजी! आप नाराज तो नहीं न होंगे? ये आप के हाथ में लड्डू से भरा सोने का थाल हैं न... क्यों नहीं दो लड्डू आप मुझे दे देते? माफ करना भगवान जी! माँ डांटेगी.. कहेगी... भीक मांगता है? आप तो मेरे सच्चे दोस्त हो न! दोस्ती में मिल-बाँट कर खाना चाहिए न?
भगवानजी ! आप तो रेशमी धोती, केसरियाँ साफ़ा पहन कर खूब जच रहे हो और आपका यह नन्हा, मासूम बाल-भक्त फटी-पुरानी कमीज पहने घूम रहा है! माँ कहती है,'भगवान सबकी सुनता है! बाप्पा! आप का भरोसा है मगर पता नहीं क्यों , न आप मेरी सुनते हो न मेरी प्यारी प्यारी माँ की.... क्यों भगवानजी? माँ आपकी घी के दिए जलाकर आरती नहीं उतारती, आपको छप्पन भोग नहीं लगाती इसलिए?
बाप्पा! ये बड़े लोग ऐसे क्यों हैं? आपके लिए तो इतना बड़ा नक्काशीदार घर बनाया है और हमारे लिए घांस-फूँस की झोपड़ी भी बनाने नहीं देते! ये नाइंसाफी है न? माँ कहती है, महाजन से कर्ज लेकर मिटटी का मकान बनाएंगे! मिटटी का चूल्हा होगा और हाँ गजानन जी...मेरे लिए मिट्टी से बनी डोलती गुड़ियाँ!
भगवानजी! रूठ गए क्या? मैं आपको नहीं भुला! माँ जहाँ दिवेली रखती है न, वहां मैं आपको स्थानापन्न करूँगा! फिर आप खुद की आँखों से ही परख लेना सच्चाई !
भगवानजी! सच कहता हूँ! मैं आप से कभी कुछ नहीं कहूँगा! मुझे आपके वो उकडी के मोदक भी नहीं चाहिए! बस! एक बार मेरी सुन लो! एक बार मैं मेरी माँ को हँसता हुआ देखना चाहता हूँ, बिलकुल पार्वती मैया की तरह!
भगवानजी ! मेरी फरियाद आप से है क्योंकि आप तो मेरे सखा हो! मैं आपको चुपके से मेरी आधी रोटी खिलाऊंगा, मोतीको खिलाता हूँ न... बिल्कुल उसी तरह ! आपको मेरा गिल्ली-डंडा भी दे दूँगा खेलने के लिए …इतना ही नहीं मेरी एक छोटीसी गिलोल है... माँ ने कल ही हाट से खरीद कर दी हुई...वह भी मैं आपको दे दूंगा... मेरे प्यारे वीरू से आपकी दोस्ती भी कराऊंगा मगर एक बार, सिर्फ एक बार मेरी माँ को हँसा दीजिये न …सूरजमुखी के खिले-खिले फूल की तरह!
अरे बाप रे! भगवान जी! आप से माँ की शिकायत करनी तो रह गई! वो चुपके-चुपके रोती है.. बापू छोड़ कर गये तब से झूठ-मुठ का हँसती है! रोटी का कौर मुँह में डालने को उठाती है और आँखों से बहते आँसू पोछते-पोछते मेरे मुँह में ठूंस देती है! मुझे तो वीर भीम बनाना चाहती है और खुद बनी है आँगन के पेड़ पर लटकती सहजन की फल्ली!
भगवानजी! सिर्फ आप ही समझा सकते है उसे! मुझे जिद्दी कहती है लेकिन भगवान जी... वो बड़ी जिद्दी है... सुन रहे हो न आप?
भगवानजी सिर्फ आपका और माँ का...
लाडला भेरु!
स्वरचित तथा मौलिक
कुसुम अशोक सुराणा |