भाग ३५
यश को देख बंसी काका का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया था। पैर से खून निकल रहा था और यश बेफिक्री से अंदर आ रहा था। बंसी काका ने उसे बैठने को कुर्सी दी और फिर भाग कर प्रथमोपचार का किट ले आएं! यह रोज का काम बन गया था उनका! रोज 'छोटे साब 'को डांटना और उनका 'डांट' को बेफिक्र हो हवा में उड़ा देना मानों दुनिया को कहना चाहते हो...
" मैं ज़िन्दगी का साथ निभाता चला गया...
हर फ़िक्र को धुएँ में उडाता.. चला गया"
बंसी काका ने यश का ज़ख्म, बह रहें खून को अच्छी तरह से साफ़ किया, एंटीसेप्टिक दवा लगाई , बैंडेज किया और ख़ामोशी से चाय बनाने चले गए!
उनका मौन बहुत कुछ बोलता था! वह जानते थे यश की यह लापरवाही किसी दिन बड़ी मुसीबत पैदा कर सकती है। वह ठहरे नौकर... भले ही घरवाले उन्हे घर का सदस्य ही मानते थे। बंसी काका अपनी मर्यादाओं को भली-भांति जानते थे! आखिर 'बड़े साहब' तो उसे ही यश की खैर-ख़बर पूछते थे..क्योंकि यश का जवाब क्या होगा यह वह पहले से ही जानते थे।
यश कभी अपनी तकलीफ़ के बारे में किसी को बताता नहीं था, अपने माता-पिता को भी नहीं! यश कहता, " हमारी तकलीफ़ हमें ही सहनी है तो फिर दूसरों को बताने से क्या फायदा? बाँटनी ही हैं तो क्यों न औरों में खुशियाँ बाँट दें ताकि वो बढ़ें! आपके गमों की फेहरिश्त सुनने-समझने की किसे फुर्सत है यारों? किसके पास वक़्त है तुम्हारे लिए आँसू बहाने का?
बंसी काका बेचारे आगे क्या बोलते? उनकी नम आँखों ने भी उन्हें यही बात समझाने की कोशिश की थी लेकिन उनकी उम्मीदें अभी भी जिन्दा थी।
यश चाय-नाश्ता कर अपने कमरे में लेट कर आराम कर रहा था तभी विभा का फोन आया!
यश बोल पड़ा, " गजगामिनी! चैन से सोने भी देगी या नहीं?
वह मुस्कुराकर बोल पड़ी, " मैं तो टेस्ट कर रही थी मेरे 'मैचो मैन' को! यश! जोक्स अपार्ट... डॉक्टर से बात कर.. यह बार-बार जख्म का होना ठीक तो नहीं हैं न? कुछ न कुछ समाधान तो होगा ही न उसका? "
विभा की बात को अनसुना कर यश हँसने लगा! यहीं तो उसका नुख्खा था बात को टालने का!
अब विभा ने भी चंडी का रूप धारण कर लिया था!
"यश! कब तक हर बात तो मज़ाक में टालते रहोगे? कभी तो गंभीर हो कर बात करों न यश! अभी के अभी डॉक्टर की अपॉइंटमेंट लो पहले.. मैं आऊंगी तुम्हारे साथ इस बार! "
यश समझ गया.. अब इस रणचंडी को शांत करना आसान नहीं हैं! वह बोल पड़ा, "जो आज्ञा जगदम्बे! अभी फोन करता हूं..."
विभा ने फोन रख दिया था लेकिन यश जानता था यह 'वार्निंग बेल' है... अब इसे और नहीं खींच सकते! उसने डॉक्टर से बात कर परसो शाम छ: बजे की अपॉइंटमेंट ले ली और विभा को फोन कर बता भी दिया! मन ही मन वह आनंदित था कि विभा को उसकी चिंता है।
कितना अच्छा लगता है यह जानकर कि किसी को उसके क्रिया-कलापों से फर्क पड़ता है। कोई उसके दर्द को महसूस करता है! यश का मन ऊँचे आकाश में उड़ान भर रहा था। उसके पंखों में गज़ब का बल आ गया था! लाँघना चाहता था वो क्षितिज की सीमा-रेखाओं को! यह सच था कि किसी की प्यार भरी डांट भी कभी-कभी मुरझाये पौधे को कांट-छांट कर नव-जीवनामृत प्रदान कर देती है! किसी के तीर से चुभते शब्द मन में लक्ष्य को प्राप्त करने का जुनून भर देते है। इन्सान भले ही अकेला आया है, अकेला जाने वाला है लेकिन उसे किसी न किसी का प्रोत्साहन आगे बढ़ने के लिए प्रेरीत करता ही है फिर वह कोमल हाथों का स्पर्श हो या तीखे शब्द-बाण!
अभी वह आराम ही कर रहा था कि उसे कॉलेज के बैडमिंटन कोच नितीन सर का फोन आया! नितीन सर उसे बहुत चाहते थे क्योंकि यश ने उन्हें गर्व करने लायक बहुत से मौके दिए थे पांच साल में जब वह उसके कोच थे! जूनियर छात्र जो दो दिन पहले उनके साथ मैच खेल रहें थे उन्होंने उन्हें बताया था कि यश और विभा कल उनके साथ खेल रहें थे!
सर ने कहा, "यश! तुम्हें कोर्ट पर उन्होंने देखा तो मैं समझ गया..यह तुम्हारी दीवानगी ही हैं खेल के प्रति जो तुम्हें फिर से कोर्ट पर ले आई! यश! क्या वाकई तुम बैडमिंटन खेलना चाहते हो?
दूसरी ऒर से 'हाँ' में जबाब आते ही सर बोल पड़े, " यश! कल रविवार हैं। तुम और विभा दोनों मेरे घर पर दोपहर तीन बजे आना... हम साथ में चाय पिएंगे! मैं फोन कर विभा को भी बोल देता हूं! तुम भी उसे बोल देना!"
यश की खुशी का ठिकाना ही नहीं था! शायद उसकी मन की बात रच्चनहारे ने सुन ली थी!
कुछ समय बाद विभा का ही फोन आया और उसने नितीन सर की बात दोहराई और कल तीन बजे उनके यहाँ दोनों के एक साथ पहुँचने की बात पक्की हो गई!
विभा आज बहुत खुश थी! कॉलेज के नामी बैडमिंटन के कोच ने उनका संज्ञान ले कर उन्हें चाय पर बुलाया था! यश का पुन: बैडमिंटन कोर्ट पर पहुँचना, खेलना उनके लिए बहुत ही महत्त्वपूर्ण बात थी! एक खिलाडी के प्रतिभाशाली होने के बावजूद अपने कॉलेज, विश्वविद्यालय, देश के लिए स्पर्धा में खेल पाने में असमर्थता उसके लिए कितना पीड़ादायक होता होगा यह एक चोटी का खिलाडी जो कि आज कोच के रूप में था, वहीं समझ सकता था।
विभा अभिभूत थी! वह अपनी मित्र-मण्डली का इंतजार कर रही थी कि कब वह आएं और कब वह अपनी खुशियों को उनके बिच बाँट सकें।
ज़िन्दगी भी बड़ी अजीब है! एक रास्ता बंद करती है तो दूसरी तरफ अनेक रास्ते खोल देती है! यह समझ से परे हैं कि आखिर वह ऐसा करती ही क्यों हैं?
क्यों सरल-सरपट दौड़ती ज़िन्दगी की रफ़्तार को संघर्षों के अवरोध, स्पीड-ब्रेकर खड़े कर धीमी कर देती हैं? शायद नीली छतरीवाला इस युवा टीम की ज़िद, जीवट, जिजीविषा और जज्बे का इम्तिहान लेना चाहता हैं...
मगर क्या करें? यह मित्र-मण्डली हैं कि शरणागति स्वीकारने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं हैं!
वो जानते थे, असफलता सफलता की पहली सीढ़ी हैं! पिछले कई चन्द्रयानों की असफलताओं के बावजूद भी क्या 'इसरो' के युवा वैज्ञानिकों ने अपने अभियान बंद किएं थे ? नहीं ना?
इसी जीवट के कारण ही तो अंत में चंद्रयान 3 मिशन कामयाब हुआ था ! फिर हम क्यों मानें छोटे-मोटे अवरोधों के सामने हार ?
सकारात्मक विचारों की यहीं ऊर्जा उन्हें आगे बढ़ने तथा निर्धारित मार्ग पर निरंतर चलने की प्रेरणा दे रही थी!
अभी छ: बजने को कुछ समय बाकी था और वैदेही और वज्र पहुँच गएँ थे ! पीछे-पीछे यश भी गुनगुनाता हुआ पहुंच गया था! विभा उत्साहित थी! दिल खोल कर बातें हो रही थी! उसने लाली को चाय और पकौड़े बना कर लाने के लिए कहा! वज्र के लिए फ्रूट सैलड बना कर तैयार रक्खा हुआ था!
वह जानती थी कि थोड़ा समय बीता नहीं की, वैदेही की मीठे की माँग आ ही जाएगी इसीलिए उसने बासुंदी भी बना कर फ्रीज में रक्खी थी!
नुक्कड़-नाटक पर विभा ने सभी से अपने-अपने सुझाव मांगे थे! यश ने बंदरिया के खेले को थोड़ा और समय देने को कहा तो वैदेही ने शुरुआत में विभा द्वारा प्रस्तावना का सुझाव दिया! वज्र ने कहा कि अंत में हमारे सन्देश को हमें रेखांकित करना चाहिए!
आज सभी पूरी तैयारी से आएं थे! विभा ने सभी की पूरी तैयारी का लेखा-जोखा लिया और अंतिम मंचन के पहले पूरे गेट-अप में रंगमंच पर रिअर्सल करने की सलाह दी! सभी ने विभा की दिल खोल कर तारीफ़ की और अंत में सब बासुंदी का मज़ा लेने लगे!
ज़िन्दगी का कठिन दौर गुजर चूका था। वक़्त की तपती धरा पर अब उम्मीदों की पहली बारिश की फुहारें बरस रही थी और मिट्टी की खुशबू से सारी फ़िजा महक रही थी! रातरानी ने अंगड़ाई ले ली थी और नन्हें-नन्हें फूल सितारों के साथ लुका-छुपी खेलते-खेलते मुस्कुरा रहें थे..
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई |
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