नाराजगी!
माँ-बाबूजी नाराज थे मुझ से... दिल जो तोड़ा था मैंने उनका शीशे के फूलदान सा! आँगन के जामुन के पेड़ से टूट कर धरा पर अस्तव्यस्त बिखरे जामुन से बिखरे थे उनके अरमान! एकलौती बेटी थी न मैं उनकी! धूमधाम से करना चाहते थे वो मेरी शादी! उनके सपनों का जवाई चुनने का मौका ही नहीं दिया था मैंने उन्हें! न अपनी बेटी को दुल्हन के साज-श्रुँगार में देख पाएं थे वो न अपने पुश्तेनी घर को दूल्हा-दुल्हन सा सजा पाएं थे वो! 
उम्मीदों की पुट्टी से जगमगता, सपनों के अनगिनत इंद्रधनुषि रंगों से सजा, हँसी की फुहारों से भीगा, मांडना-रंगोली से सजा, बच्चों की किलकारीयों, मंगल-गीतों से गुंजता, गेंदे के फूल, अम्बवा की पत्तियों की वन्दनवार से सजा विवाह का घर देखना चाहते थे वह!
नासा का ऑफर ठुकरा न पाई थी मैं! मेरी सारी जद्दोजहद उसके लिए ही तो थी! दिल पर पत्थर रख कर हॉं भरी थी माँ ने! सात समंदर पार, अंतरिक्ष के रहस्यों को जानने के मिशन को यथार्थ का जामा पहनाते-पहनाते मैं कब व्यंकटेश के प्यार में खो गई, पता ही नहीं चला! अगले मिशन पर साथ साथ जाने से पहले हमें एक-दूसरे का हो जाना था... न जाने सही सलामत लौटेंगे पृथ्वी पर या नहीं...
सब कुछ इतना जल्दी हो गया कि समय ही नहीं मिला माँ-बाबूजी को विश्वास में ले कर समझाने में!
आखिर कुछ पाने के लिए कुछ खोना भी तो पड़ता हैं न...

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई 

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