मित्रता!

शीर्षक : मित्रता!

इतिहास के पन्नों पर अंकित मित्रता का प्रतिमान है,
कृष्ण-सुदामा की मित्रता द्वारकाधिश की पहचान है!

मित्रता तोली नहीं जाती सिक्कों से लदे तराजू में,
रश्मियों का मूल्य आंकों घनघोर घटा-घिरे व्योम में!

रिश्तों के उलझे धागों में दांव पर लगाएं मित्रता को!
स्वार्थ में फंसा मानव मित्रता से खोले उलझे पेच को!

रुधिर से सिंचित रिश्ते मूल्यविहीन खड़े जब अंक में,
मित्र निज अधरों से खींचे तन में घुला गरल डंख में!

वक़्त का बदले मिजाज़ शोहरत की ऊँची चोटियों पे,
सखा-सखी ही हैं जो साथ दे श्वास रोक चोटियों पे!

जुगनुओं की जगमग में छुप जाएं सितारें अंधेरों में,
दीये की लौ मित्र सी आलोकित करे पथ आँधियों में!

रिश्ते-नातों के चक्रव्यूह में उलझा मनुज संसार में,
मित्रता पर नौछावर कुबेर-भण्डार मिथ्या संसार में!

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र |

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