रफ़्तार! रफ़्तार पकड़, दौड़ती-भागती रेलगाड़ी!
फटी थी चोली, चिथड़े-चिथड़े साड़ी,
बिखरे बाल, अधरो पर थी खड़ी बोली!
छाती से बंधा शिशु, लटक रही झोली!
कानों में गूंजती थी कर्कश, तेज आवाज!
दौड़ते-भागते, पेड-पौधों का आगाज़!
सर्द हवाओं में शाल, मफ़लर लपेटते यात्री!
फटे दुपट्टे से मुन्ने को छुपाती-ढकती जन्मदात्री!
कड़ाके की ठंड में हड्डियां गलाती लहर,
दांत किटकिटाती शीत-समीर का कहर!
"माई! रोटी दो न माई! दो दिन से भूखी हूं माई!"
जैसे ही गिड़गिड़ाने लगी नन्हें की आई,
पिघली बुढ़िया की आत्मा, अखियां डबडबाई!
गठरी से निकाली दरी, गुदड़ी के लाल को ओढ़ाई!
पुरानी नऊ-वारी को कर छ-वारी, ढंकी माई!
संक्रांति पर्व ‌‌‌‌पर दान-पुण्य कर की कमाई!
कोविड के कहर की कीमत कितनी कालजई!
बेटा, बहू, पोते को मुखाग्नि दे अभी-अभी थी आई!

स्वरचित तथा मौलिक,
द्वारा कुसुम अशोक सुराणा, पवई, मुंबई, महाराष्ट्र
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