अभिलाषा..

कुंज-कुंज खिलने दो कलियां, सूरज से हो आँखें चार!

स्तनधारी के शिशु का हो, मां के दूध पे पहला अधिकार!

धरती का सीना चीर, निहारता अंकूर सृष्टि का प्रवेश द्वार!

सांसों पे हो अपना राज, हो शुद्ध पवन, पानी, पौष्टिक आहार!

नाना-नानी, दादा-दादी, माता-पिता का मिले प्यार-दुलार, 

खेल-खिलौने, गुड्डे-गुड्डी, सखा-सहेली हो सपनों का आधार!

शिक्षा-दीक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा पर हो, हर बच्चें का अधिकार!

बस्तें, स्पर्धाएं, आकांक्षाएं, न कुचले मासूमों का संसार!

असमय न पड़े बच्चों के कोमल कंधों पर दुनियादारी का भार!

ईट के भट्ठे, दहकते अंगारे, जलते तंदूर न हो अभागों के यार!

बेरहम दुनिया के बाशिंदे, नित खेले खून की होली!

काश! बच्चों के सौदागर, न लगा पाएं मासूमों की बोली! 

भले हर फूल की किस्मत का हो, अलग-अलग लिखाण!

कोई दरिंदा न लील ले, खिलने से पहले, पंखुड़ी के प्राण!

आएगी बहारें, चहकेंगे परिंदे, खिलेंगे फूल, बहकेगा गुलिस्तान!

मुस्कुराएगी कायनात, महकेगी फिज़ा, महफूज रहेगा बचपन!

स्वरचित तथा मौलिक,

कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र 

 

 

 

 

 

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