प्रपोज...
क्यों वक़्त-बेवक़्त चले आते हो?
दिल के द्वार पर देते हो दस्तक?
चुरा लेते हो नींदे अक्सर,
पीछे छोड़ते हो यादों का बवंडर!

क्या बनोगे मेरे दिल की धड़कन? 
सजाओंगे मेरे ख़्वाबों का उपवन?
क्या आँखों में होगी तेरी ही छवि?
रश्मियों के तोरण सजायेगा रवि?

प्राची भूली शैशव के हाव-भाव, 
सूरज ने दिया मिलन का प्रस्ताव!
सुनहरी धूप से छनकर आई बुन्दे,
इंद्रधनु ने लटकायें सतरंगी फुन्दे!

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम सुराणा, मुम्बई 



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