शीर्षक : मैं बावरा...
बीबी आई जब से घर में, हँसी गया मैं भूल!
हिम्मत नहीं, किसी को भी दूँ गेंदे का भी फूल!
शादी के लड्डू खाने दिल दीवाना था अभिभूत,
शादी के बाद मैं भूला-बिसरा प्राणी अदभुत!
कितने ख़्वाब सजाएँ आँगन की खटिया पर,
शेष रह गएँ टेड़ी-मेढ़ी रस्सियों में उलझे कलेवर!
बीबी की उपस्थिति में मज़ाल हैं निकले बोल,
मुँह बंद रख सहूँ मुक्के की मार, कैसे खोलूँ पोल?
रात-रात,जाग-जाग कर की चाकरी बीबी की
क्या करूँ? दहेज़ में लाना भूली दासी पीहर की!
गृह-लक्ष्मी-वाहन उल्लूँ हँसू या रोऊ बार-बार,
कमलपुष्प विराजिनी, रति छाई ह्रदय में अपार!
ढ़ोल-नगाड़े, बजी शहनाई करने मुझे आगाह,
मैं बावरा,भोला-भाला, सुध-बुध भूला, सहूँ कैसे विरह?
स्वरचित तथा मौलिक,
द्वारा कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई, महाराष्ट्र!