सर्द हवा में लहराया,
रेत पे सोया नन्हा बालक,
खिल-खिला कर मुस्कुराया!
आँखें मलते-मलते बोला..
चंदा मामा! चंदा मामा!!
क्यों छुपा-छुपी खेलते हो?
बादलों के पीछे अनार जला,
दुम दबा कर भागते हो?
क्यों हवा के संग झूम-झूम,
नटखट शिशु सी तालियाँ बजाते हो?
क्यों गुल्लक को फोड़ कर ....
तारों के सिक्के उछालते हो?
चंदा मामा! चंदा मामा!!
क्यों अक्सर वादा भूल जाते हो?
माँ-बापू की तरह चुपके से,
परियों के देश भाग जाते हो?
क्यों ठण्ड में भी फटे चीथड़ों में …
आसमान तले छोड़ जाते हो?
क्यों चांदनी का थान खुद ओढ़ ....
नंगे बदन सुला जाते हो?
चंदा मामा! चंदा मामा!!
क्या फ़ोन लगाएंगे बापू को?
मेरा सन्देशा ढोल, नगाड़ो संग
पहुँचाओंगे बापू को?
सब मना रहे 'पितृदिवस'....
क्या तुम गुल्लक ले आओगे?
भर-भर सिक्के उसमें,
माँ को खनखनाहट सुनाऊंगा...
पल्लू से आँखें पोछती माँ,
आसमान से लौट आएगी।
झटपट रोटी बना चूल्हे पर,
दो-कौर मुझे खिलाएगी।
बापू! आओगे न आप?
मैं खिलौना नहीं मांगूंगा।
जैसा आप कहेँगे वैसा ही रहूँगा।
हम दूध-पोहे माँ के साथ,
चन्दा को भी खिलाएंगे...
'पितृदिवस' का जश्न खूब-खूब मनाएंगे!
स्वरचित तथा मौलिक,
द्वारा कुसुम अशोक सुराणा