नमन माँ शारदे
कलाधर घनाक्षरी
दंभ द्वेष अग्नि तेज, ज्वाल स्वार्थ सोच हेज, दुष्ट भाव से विनाश, भ्रांत बुद्धि मानिए।।
गाँव देश हो विशेष, वृक्ष ठाँव हो अशेष,
गीत ताल नेह डोर, छाँव शीत पाइए।।
नाथ थाम हाथ नित्य, हो उजास पाथ सत्य, धर्म कर्म सार्थ कृत्य, आप छत्र थामिए।।
नेह तेज पुँज हेत, सृष्टि रूप रक्ष चेत, ध्यान ज्ञान योग श्रेष्ठ, विश्व शांति धारिए।।
चंचल जैन