गुरुदेव का प्रवचन धाराप्रवाह चल रहा था।
एक-एक शब्द मानों ओस के बूंदों की शीतल बौछार! मधुर, मीठी आमिरस वाणी! सारा वातावरण मानों इत्र की सुगंध से सुरभित था! तपस्वीयों की शारदीय नवरात्रि की ओली की तपस्या चल रही थी! सभी गुरु की अमृतवाणी सुन कर्म निर्जरा करने के लिए उत्साहित थे!
तभी अचानक जोर-जोर से “मारो, काटो, भगाओ” की आवाजें आने लगी! सभी विस्मित थे! लोगों के झुण्ड हाथों में लट्ठ, तलवारें लिए गुज़र रहें थे! धीरे- धीरे आवाजें धीमी पडती गई और पल भर के ठहराव के बाद, फिर प्रवचन शुरू हो गया!
गुरुदेव का आज तीसरा उपवास था! उनकी धीर-गंभीर मुद्रा, चेहरे का अद्भुत तेज और बोली की खनक अनायास ही उनके प्रति मन में आदर भाव जगा रही थी!
तभी गुरुदेव बोल पड़े! ” पहचाना आपने यह कौन थे? इंसान नहीं हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई थे वह! मैं आज तक समझ नहीं पाया, विश्व का कौनसा ऐसा धर्म है जिसमें से इंसानियत को घटा दो तो कुछ बचेगा मानवजाती के लिए?”
सभी खामोश थे! गुरुदेव की वाणी में दर्द झलक रहा था! वह आत्मविश्वास से भरे थे! ” हंस भी अगर क्षीर-नीर की परीक्षा कर सकता है, भेद जान सकता है तो हम मनुष्य क्यों नहीं? ईश्वर की सबसे ज्यादा नेमतें तो हमें मिली हुई हैं, तो फिर यह मति-मंदता, अहंकार क्यों?”
गुरुदेव ने आँखों में अन्जन डाल दिया था! दिमाग़ की बत्तियां जल उठी थी! दंगल का वह डरावना मंजर आत्मावलोकन को मजबूर कर रहा था! दिमाग़ में एक ही सवाल गूंज रहा था, ” आखिर हम हैं कौन? राजनेताओं के हाथ की कठपुतलियाँ? अँधे-बहरे धर्मावलम्बी ? इंसानियत के पुरोधा या दुश्मन? परम पिता परमात्मा की सुन्दर कृति या सृष्टी का विद्रुप चेहरा?
गुरुदेव के धिक्कारतें शब्दों के बाद मन के शांत सरोवर में उठते आवर्तों को रोकने का प्रयास बेमानी था! मन को माँ दुर्गा का महिषासुरमर्दिनी रूप झकझोर रहा था तो दूसरी ऒर महागौरी का तेजोमय, जगत कल्याणी रूप सोचने, आत्म-मंथन करने को प्रेरित कर रहा था। अंतस के भीतर की यह उथल-पुथल भीतर मानवता जिन्दा होने का प्रमाण था।
मानवीय मूल्यों की जयणा करते गुरुदेव के शब्द आत्मनिरीक्षण करने को मजबूर कर मन के शांत सरोवर में हलचल मचा रहे थे तो दूसरी ऒर सोचने को मजबूर कर रहे थे कि आखिर हम हैं कौन?
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।