ये प्यार ही तो ज़िन्दगी.. भाग ३०
भाग ३०

अप्पा को बच्चों को देख अपने जवानी के दिन याद आ रहें थे! सालों से उनका परिवार कराड में रह रहा था! यह यशवंतराव चव्हाण जी की दूरदृष्टी कहियें या भविष्य के आईने में झाँकने की क्षमता कि उन्होंने ग्रामीण क्षेत्र के विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा प्राप्त हो सकें इसलिए एक विद्यानगरी बना दी थी.. नदी के उस पार! बरसों पहले इस विद्यानगरी में गरीब विद्यार्थियों को शिष्यवृत्ति दे कर आकर्षित किया जाता था शिक्षार्थी बनने के लिए! 

अपने पूर्वजों के कर्मयोग में अप्पा कैसे पीछे रहते? ज्ञान का महत्त्व जानते थे वो! सिर्फ कृषि पर आधारित अर्थव्यवस्था से सर्व-समावेशी विकास संभव नहीं था यह राजनेता से लेकर समाज का हर व्यक्ति समझ चूका था! तब राजनीति में हो या पर्यावरण में प्रदुषण की मात्रा इतनी नहीं थी, जितनी आज है!
अप्पा विद्यार्थी जीवन से ही राजनीति से प्रेरित थे! उनके इर्दगिर्द जो राजनेता थे वो राजनीति को समाजसेवा का अलभ्य मौका मानते थे...
अप्पा को अगर विभा ने आवाज़ न दी होती तो न जाने कब तक वो यादों के बवंडर में गोल-गोल घूमते रहते!

नुक्कड़-नाटक मण्डली के सभी सदस्य 'हॉटेल अदिति' पहुँच चुके थे...सुबह का नाश्ता तो कब का पेट में चूहें चट कर चुके थे और अब भूख के मारे इधर-उधर उछलकूद कर रहें थे...हॉटेल के कर्मचारियों द्वारा तीन टेबल एक-दूसरे से जोड़ दिए गएँ थे... वज्र, वैदेही आमने-सामने बैठे थे और यश, विभा एक-दूसरे के पास और सामने अप्पा!
वज्र पोंगल देख बहुत खुश हुआ! यह उसकी पसंदीदा डिश थी! बाकी सभी के लिए मक्खन लगी तंदूरी रोटियाँ , दाल-मखनी, पालक-पनीर, पापड़, सलाद, अचार, लहसुन और शेजवान चटनी आ चुकी थी! 
यश ठहाके लगाते हुए बोल पड़ा, " अप्पा! यह सब विभा के सामने होगा तो फिर हो गया बंटाधार...अपने नसीब में तो सिर्फ ये सलाद, चटनी ही बचेगा! देखा नहीं आपने.. पूरा पांच किलो वजन बढ़ा हैं इसका... सभी हँसने लगे.. अप्पा बोल पड़े, " बैडमिंटन खेलेगी.. अपने आप वजन कम हो जायेगा...
पल भर के लिए ख़ामोशी छा गई... खिलखिलाता यश अचानक नमक-मिर्च की छोटी-छोटी डिबियाँ उठा कर देखने लगा.. तभी वज्र बोल पड़ा, " अप्पा! एक बार यह नुक्कड़-नाटक सुपर हिट हो जायेगा न फिर बैडमिंटन का रुख करेंगे... एक बार यह वार्षिकोत्सव सम्पन्न हो जायेगा, फिर खेल का कोर्ट! क्या कहती हो विभा? सही कह रहा हूं न?"

विभा ने जोर से यश की पीठ थपथपाई और बोल पड़ी, 'हाय हैंडसम! दे ताली.. ' और मुस्कुराने लगी..यश कब तक ख़ामोशी की चादर ओढ़े बैठता? वह भी खिलखिला कर कहकहें लगाने लगा मानों विभा ने पारिजात के पौधे को झकझोरा हो और असंख्य फूल धरा पर बिखर गएँ हो...
वैदेही अब तक शांत बैठी थी! उसने वातावरण को हल्का बनाने के लिए पूछा, "अप्पा! तुम्हाला उद्या किती वाजता जायच आहे मंत्रालयात? "बहुतेक दुपारी चं ! विभा के आते ही मैं निकल जाऊंगा और वहाँ से ही आगे कराड  चला जाऊंगा...एक बार मंत्री जी से मिलेंगे.. फिर आगे का काम तो फोन पर भी हो जायेगा... देखते है!"

खाना बहुत ही स्वादिष्ट था! अण्णा शेट्टी स्वयं आए थे अप्पा से बात करने, कुशल-क्षेम पूछने... पुराने दोस्त जो ठहरे ! जब भी अप्पा मुम्बई आते, एक बार तो खाना खाने वहाँ जरूर खाते! 

सभी ने भोजन का लुत्फ़ उठाया और चल पड़े अपने- अपने आशियाने की ऒर...अप्पा और विभा ने यश को घर के नीचे छोड़ा और अगली प्रैक्टिस यश के यहाँ करने का वादा कर विभा और अप्पा आगे बढ़े!

अप्पा का मल्टी स्पेशलिटी अस्पताल बनाने का विचार विभा को बहुत अच्छा लगा! बड़े शहरों में आज भी अगर स्वास्थ्य सेवाओं का इतना बुरा हाल है तो ग्रामीण क्षेत्र का क्या हाल होगा? कल्पना और हकीकत दोनों से विभा वाकिफ़ थी! बचपन में उसने अपनी प्यारी अध्यापिका को कैंसर जैसी बीमारी से दम तोड़ते हुए देखा था! तब न तो इतनी समझ थी न ही इस क्षेत्र का ज्ञान! 

विभा कपडे बदलने चली गई और अप्पा भी अपने कमरे में विश्राम करने पहुँच गए... पलंग पर लेटते ही विभा नींद के आगोश में समा गई! उम्मीदों का एक समंदर उसके अंतस में हिलोरे ले रहा था और बार-बार लहरें यथार्थ के किनारे पर सिर पटक-पटक कर फिर सागर की अनन्त गहराइयोंमें समा रही थी! लहरों का एक निरन्तर जीवन संगीत जारी था...सांसों की जलतरंग पर..

विभा के अवचेतन मन के फलक पर यश का उदास चेहरा बार-बार दृष्टीगोचर हो रहा था.. आँखों में अनगिनत प्रश्न लिए..मानों पूछ रहा हो, " विभा! तुम आओगी न मेरे साथ... बैडमिंटन कोर्ट पर? और विभा उससे हाथ मिला कर कह रही थी... Why not? बेशक़! मैं तुम्हारे साथ चलूंगी.. पहले की ही तरह...हम विजेता थे, हैं और रहेंगे!"

विभा जानती थी, यश में गज़ब का आत्मविश्वास है! हार को भी जीत में बदलने का जज़्बा है! वो मन में ठान ले तो आज भी बहुत कुछ हासिल कर सकता है...विभा मन में दृढ़ संकल्प ले खड़ी हो गई! पलंग की चद्दर पर पड़ी सलवटें दूर कर उसने तकिये करीने से लगाएं और रसोई की तरफ चल पड़ी! अप्पा भी उठ कर बैठ गए थे और उसका ही इंतज़ार कर रहें थे...

उसने अप्पा को पानी का लोटा थमाया और चाय बनाने में व्यस्त हो गई... चाय की चुस्कीयाँ लेते-लेते बाप-बेटी बातें कर रहें थे और बीच-बीच में खारे बिस्किट का लुत्फ़ भी उठा रहें थे.. 
उसी समय मुख्य द्वार पर लगी बेल बजी... विभा ने दरवाजा खोला.. सामने लाली खड़ी थी.. सूती सलवार- कुर्ते  में भी बड़ी सोहनी लग रही थी वह! साँवला रंग, तीखे नयन-नक्श, घूँघराले, लम्बे, तेल लगे, चमकते श्यामल केश, चेहरे पर मुस्कान और लड़कपन! हाथ में छोटी सी हैंड बैग लिए वह अंदर आई... "ताई! अप्पा कधी आले?" वह बोल पड़ी!
अप्पा भी उसकी आवाज़ सुन हॉल में आ चुके थे..
उसने दोनों को प्रणाम किया और 'आती हूं' कह कर स्नानघर में चली गई...
विभा अब थोड़ी रसोईघर की जिम्मेदारियों से मुक्त हो गई थी! उसने लाली को भी चाय-बिस्किट ले कर कुछ समय आराम करने को कहा...और खुद अप्पा से बातों में व्यस्त हो गई...

अप्पा विभा के स्वास्थ्य में अपेक्षा से भी बढ़ कर हुए सुधार को देख कर बहुत प्रफुल्लित थे! मित्र-मण्डली की गाड़ी फिर से अब पटरी पर लौट चुकी थी और दुर्घटना की डरावनी और तकलीफदेह यादें अब अतीत का हिस्सा बन चुकी थी... यह देख कर अप्पा बहुत उत्साहित थे...

आजकल की पीढ़ी की यह बात अप्पा को बहुत पसंद आती थी...ये नई पीढ़ी  पुरानी बातों को चॉकलेट की तरह चूसते नहीं बैठते बल्कि आइस्क्रीम की तरह पिघलने से पहले ही खा जाते हैं! इनकी याददास्त का गुल्लक इतना भरा-पुरा होता है कि उसमें बीती बातों के सिक्के खाली किए बिना नयों के लिए जगह ही नहीं बचती... वह अतीत को भूल वर्तमान में जीते हैं! इसीलिए इनके जीवन पर भूतकाल के सायें हावी नहीं होते और इनका वर्तमान उजालों से आबाद रहता हैं! अप्पा चारों की मित्रता देख भी फूले नहीं समाये थे! 
उन्होंने शांत चित्त से अपने लक्ष्य के ऊपर ध्यान केंद्रित किया! कल साथ में कौन-कौन से पेपर ले जाने हैं, क्या- क्या गाड़ी में रखवाना हैं और कौनसे कपडे पहनने हैं, सभी की अभी से तैयारी हो चुकी थी! अप्पा ने
'कल करे सो आज कर, आज करे सो अब, 
पल में परलय होयेगा, बहुरि करेगा कब " 
इस दोहे को अपने दैनंदिन जीवन ने बड़ी खूबी से उतारा था क्योंकि इसी में उनकी अद्भुत सफलता का राज छुपा था... कल के अरुणोदय का उन्हें बेसब्री से इंतज़ार था क्योंकि प्राची की लालिमा ही तय करने वाली थी कि ग्रामीण जनमानस के जीवन में भोर का सपना, सपना ही बन कर रहेगा या कभी हकीकत भी बन पायेगा....

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई |
अगला भाग अगले अंक में....
इस पर लोग क्या कह रहे हैं
  • बहुत ही सराहनीय है। इसे पढ़कर मुझे बहुत खुशी हुई