ऋतु सावज़न की....चौपाई छन्द

ऋतु सावन की सुन्दर आई।
केसर क्यारी जग महकाई।।
घिर-घिर आई कारी बदरी।
खग-गण गाएं मीठी कजरी।।

अमृत कलश से मात नहाई,
कजरी गाएं लोग-लुगाई,
बूंद-बूंद भर गगरी लाई,
खेत-खलिहान रंगत छाई।

सूरजमुखी लड़ाएं नैना,
तारों से सज आई रैना,
ढ़ोल-मंजिरें, मृदंग बाजे,
मुरली श्रीहरि मुख में साजे।

सृष्टि मात का आँचल ओढ़ो।
प्यारे ममता बन्ध न तोड़ो।
धरा-गगन से नाता जोड़ो।
प्रकृति माँ का गुल्लक फोड़ो।

रस बरसाता भोला अंबर।
पृथ्वी रज में बसते शंकर।।
जग हर्षित हो पूजे कंकर।
सृष्टि मात का निर्मल मंतर।।

रंग बसन्ती देखो छाया,
धरती ने आँचल लहराया।
कानन-कानन जश्न मनाया,
रोम-रोम पुलकित हो पाया।

घोल सृष्टि में अमिरस-हाला,
शिव ने पिया जहर का प्याला।
भस्म लगा तन शंकर भोले,
सुख-समृद्धि के ताले खोले।

नाचत-नाचत बढ़ते भोले।
तांडव देख दुष्ट हिय डोले।
नीलकंठ जग तारणहारे।
भूत-प्रेत है शशिधर प्यारे।।

सुख साता की जयणा करती।
दीन-दुखी जन पीड़ा हरती।।
सृष्टि तारिणी जननी धरती।
सौख्य-शान्ति की कावड़ भरती।।

शिव शंकर बहु भोले-भाले।
लिप भभूति वो संकट टाले।।
शशिधर मन में गौरी साजे।
हिमशिखरों में नौबत बाजे।।


'हर-हर महादेव' का नारा,
हरता पीड़ा तारण हारा।
डमरू, त्रिशूल धारी शंकर,
पावन प्रभु किरपा से कंकर।


स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।



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