भाग्य के खेल...

#विषय जीवन में संघर्षं का महत्व 
#विधा लघुकथा

बम्बई निवासी,मध्यम वर्गीय,ईमानदार, कह दो कि बड़ा नेक,मेहनतकश ,ऐसा कहो कि सर्व गुण सम्पन्न ,रमेश हर कारोबार कर चूका था,पर एक भी कारोबार में  उसे बरकत ,समझों सफलता नहीं मिली,योग ऐसा कि कभी भागीदार ने धोखा दिया, तो कभी उधारी डूब गयी,मेटल,  प्लास्टिक, प्रोपर्टी आदि दो चार करोबार ,करके देखा पर नेक रमेश का एक काम भी  ठीक से जम नहीं रहा था।विधी की विडंबना प्लास्टिक कि प्लास्टिक गोडाउन में आग लग गयी ।
कपड़े का कारोबार थोड़ा अच्छा चल रहा था, तो दुकान में बारिश का पानी‌ घुस गया और उसमें भी नुकसान उठाना पड़ा। वो कहते हैं न कि कर्म जला खेती करे , बैल मरे की हल टूटे।
ऐसी स्थिति थी ।
मेहनत तो बहुत की पर, पता नहीं रमेश का भाग्य साथ ही नहीं दे रह था। 
हर बार तो हिम्मत रखी पर, जब पिताजी के हाथ की बचत भी साफ हो गयी और उल्टे देनदारी बढ़ने लगी, हालांकि पेठ अच्छी थी तो किसी ने दबाव नहीं बनाया,  
फिर भी रमेश की अन्तर आत्मा अब तो कराहने लगी,सिसकने लगी थी।इतना अवसाद हो रहा था कि  धर्म  पत्नी लीला को, एक रात कह दिया कि मुझे मर जाने का मन कर रहा है ।लीला को अपनी स्थिति से वाकिफ करवाया, 

बल्कि लीला ने अपनी समझ व कर्तव्य परायणता व  हिम्मत का परिचय दिया, ढांढस बंधाया और पतिदेव को कहा ,ऐसे हारने से नहीं चलेगा, तुम चिंतित क्यों हो,मैं पढ़ी लिखी घर में बैठी हूॅ , मैं नौकरी कर लूंगी,जीवन में संघर्ष भी रहना चाहिए संघर्ष का भी एक महत्व है ,कभी कभी संघर्ष उल्टा हमें शक्ति शाली बनाता है ,ईश्वर पर विश्वास रखें वहीं कोई  नया रास्ता दिखायेगा, और यह संभावना हर किसी के जीवन में आ सकती है ।

और अब तो क्यों चिंता करते हो , छः महीने में, बेटे रोहन की भी तो नौकरी लग जाएगी।
और सुनो,आप निश्चिंत रहें,जब तक मैं कुछ जुगाड करती हूॅं।
तुरन्त कुशाग्र लीला ने अपने चचेरे  करोड़पति भाई विमलेश को फ़ोन मिलाया,अपनी, सारी बातें कर्म कथनी जो भी कहो विमलेश को बताई, विमलेश  तेरे जीजाजी की यह यह  स्थिति है । 
विमलेश इशारा समझ गया, विमलेश ‌ने एक सैंकड की देरी न कर अपनी बंबई की बंद पड़ी मेटल कारोबार की आॅफिस की चाबी देकर रमेश को भागीदार बना कर बिठा दिया। और उल्टा बहन को डांटा कि तुम मुझे अब बता रही हो, मुझे पहले बता दिया होता, ईमानदार आदमी के अभाव में यह ब्रांच बंद करनी पड़ी,
विमलेश को एक ईमानदार व मेहनती आदमी की वैसे भी जरुरत थी । 
अवसाद में घीरा रमेश अब करोड़ों में खेल रहा है।वरना वो कपड़े की छोटी मोटी दुकान ही चलाता होता।

स्वरचित: अशोक दोशी
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