कुण्डलिया छन्द
कुण्डलिया छन्द!

1.

मंतर शिव आराधना,भक्ति-शक्ति का वास।
याचक करता प्रार्थना, सुखमय जीवन आस।।
सुखमय जीवन आस, डोलती आँगन डाली।
सावन आया रास, नाचती सुन्दर बाली।।
दस्तक पा कर आज, बैठना भोले शंकर।
गौरा खोले राज, बोलती नित शिव मंतर ।। 

2.

बचपन बीता खेल में, पीछे छूटी याद।
पचपन की मैं हो गई, भूली वाद विवाद।।
भूली वाद विवाद, जोड़ती सबसे नाता।
बचपन से संवाद, दोहिता आता-जाता।।
पोता मेरा दोस्त, अविचलित गज़ब लड़कपन।
बच्चें में बन बाल, खोजती अपना बचपन।।
   
स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई।
इस पर लोग क्या कह रहे हैं
  • वाह वाह! बहुत खूब! सुन्दर प्रस्तुति!
  • आप से जुड़ कर, कविता पढ़ कर बहुत अच्छा लगा!🙏❤️🙏❤️🙏