हिचकियाँ!
हिचकियां याद दिलाती रही,
यादों के झरोखों से मैं झांकती रही!

पत्तों की सरसराहट में छुपी तेरी आहट!
बादलों की गड़गड़ाहट सी डांट-डपट!
परिंदे की फड़फड़ाहट में छुपी चाहत!
फूलों की खिलखिलाहट में घुली राहत!

हिचकियां याद दिलाती रही,
यादों के झरोखों से मैं झांकती रही!

आंगन में खेलते, क़हक़शें लगाते बच्चे!
फूलों से लदे पारिजात, मोगरे के पौधे!
वो चित्रकारी से सजा तुलसी वृंदावन!
तोरण, रंगोली को तरसता घर का आंगन!

हिचकियां याद दिलाती रही,
इर्द-गिर्द मां तेरा एहसास जगाती रही!

जन्मदिन प‌र‌ तरसी मैं तेरी दुआओं को!
मीठे-मीठे बोलों को, तेरे आशिषों को!
भटकती रही मैं यादों के बवंडर में,
जादुई झप्पी देती मां हमें सौगात में!

हिचकियां याद दिलाती रही,
झूठे वादोंसे अक्सर हमें भरमाती रही!

मां से बड़ा दुनिया में कहां है कोई ओहदा!
चिर-प्रयाण को निकल पड़ी छोड़ घरौंदा,
शाम होते ही मां लौटती थी बच्चों के पास!
व्याकुल है मनवा! क्यों पूरी हुई न आस?

हिचकियां याद दिलाती रही,
दरों-दीवारें चीख-चीख कर कहती रही!
पगली! भले ही ... हिचकियां आती रहे...
मां लौट कर नहीं आएगी!

स्वरचित तथा मौलिक,
कुसुम अशोक सुराणा, पवई, मुंबई, महाराष्ट्र।
इस पर लोग क्या कह रहे हैं
  • बहुत ही सराहनीय है। इसे पढ़कर मुझे बहुत खुशी हुई