आओ... आओ! महफ़िल-ए-रौनक चाँद-सितारों से गुफ़्तगु कर ले!
ज़िन्दगी के हसीन लम्हें, हथेलियों में समेट ले!
दर्द बाँट, खुशियाँ उछाल फ़िजा को महका दे,
ज़िन्दगी का जश्न-ए-मंजर, चटक रंगों से भर दे!

आओ! स्वछन्द परिंदों से गुफ़्तगु, गुटर गु कर ले,
पंखों को गज़ब का बल दे आसमान नाप ले!
स्वेत बादलों पे हो सवार, सात-समंदर पार कर ले!
ज़िंदगी का अमिरस प्याला, गुलाबी अधरों से छूँ ले!

आओ! शतायु बरगद की जटाओं से गुफ़्तगु कर ले!
डाल-डाल पात-पात छूँ अनुभव का जाम पि ले!
धरती चूमने आतुर नागिन सी जटाओं से पाठ पढ़ ले!
आँखों में अंतरिक्ष के सपने, पैर जमीं पर धर ले!

आओ! ढलते सूरज से बुजुर्गों से गुफ़्तगु कर ले!
सहस्त्र रश्मियों को विश्राम दे नेह-रजाई धर ले!
थरथराती भुजाएँ थाम अन्तस-पीड़ा साँझा कर ले!
लड़खड़ाते कदमों को सम्मान दें बाहों में भर ले!

आओ! दीन-दुःखियों से गुफ़्तगु कर पीड़ा हर ले!
डूबती कश्ती को सहारा दे साहिल का दीदार कर ले!
खामोश लहरों में चट्टानों से भिड़ने का जुनून भर दे!
माहताब देख ज्वार-भाटा सा मन में उछाल भर दे!

स्वरचित तथा मौलिक,
द्वारा कुसुम अशोक सुराणा, मुम्बई |


इस पर लोग क्या कह रहे हैं
  • वाह! सुन्दर
  • क्या खूब लगती है, बड़ी सुन्दर दिखती है ❤️❤️❤️❤️
  • बहुत खूब.. दीप से दीप जलेंगे तो जीवन रोशन हो जायेगा! प्रेरणादायक सुन्दर प्रस्तुति!